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उस्ताद की याद में सजेगी बुढ़वा मंगल की महफिल
ब्यूरो, अमर उजाला, वाराणसी
Updated Wed, 15 Mar 2017 01:22 AM IST
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बिस्मिल्लाह खां
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संगीत के शहर बनारस में इस बार बुढ़वा मंगल का संगीतोत्सव हर किसी के लिए खास होगा। बुढ़वा मंगल और शहनाई के जादूगर उस्ताद बिस्मिल्लाह खान की जयंती एक ही दिन होगी। इसलिए संस्कृति विभाग ने इस जलोत्सव को उस्ताद के नाम समर्पित करने का फैसला किया है। पं. रविशंकर की पुत्री अनुष्कार शंकर के बैंड में चलने वाले शहनाई के नामचीन कलाकार संजीव शंकर और अश्विनी शंकर की शहनाई अबकी बुढ़वा मंगल के खुशनुमा मौके को यादगार बनाएगी। 21 मार्च को बुढ़वा मंगल अस्सी घाट पर होगा।
काशी में ‘बुढ़वा मंगल’ की करीब 273 वर्ष पुरानी परंपरा को यादगार बनाने के लिए संस्कृति विभाग ने तैयारियां तेज कर दी हैं। इसके लिए मंडलायुक्त नितिन रमेश गोकर्ण की अध्यक्षता में एक दौर की बैठक भी हो चुकी है। अस्सी घाट पर गंगा की लहरों पर बजड़ों, नावों के झूमर लगाए जाएंगे। लकदक कुर्ता, पायजामा, दुपलिया टोपी के साथ बन ठन कर काशी के लोल बुढ़वा मंगन की संगीत महफिल में पहुंचेंगे। फागुन के आखिरी मंगल को लगने वाली ‘बुढ़वा मंगल’की इस महफिल में इस बार संजीव शंकर और अश्विनी शंकर की शहनाई गूंजेगी। उत्सवों की नगरी काशी में ‘बुढ़वा मंगल’ की नायाब सांस्कृतिक परंपरा रही है।
1729 में इसकी शुरुआत मीर रुस्तम अली ने की थी। तब काशी नरेश से लेकर आसपास की राज-रियासतों के रजवाड़ों की मोरपंखियों, परियों, हंसों के जोड़ों वाली नावों, शाही बजड़ों के समूहों पर नृत्य-संगीत की महफिलें सजती थीं। उन्हीं नाव-बजड़ों से काशी के रईसों के भी सुसज्जित बजड़े जोड़े जाते थे। गंगा के जलमार्ग पर खाने-पीने की वस्तुओं के साथ मेला लग जाता था। मेहताबी रोशनी में कहीं नृत्य, कहीं गायन तो कहीं साज बजते थे और संगीत रसिकों के समूह उस रस का आनंद उठाते थे। तब यह महफिल रात भर चलती थी।
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काशी में ‘बुढ़वा मंगल’ की करीब 273 वर्ष पुरानी परंपरा को यादगार बनाने के लिए संस्कृति विभाग ने तैयारियां तेज कर दी हैं। इसके लिए मंडलायुक्त नितिन रमेश गोकर्ण की अध्यक्षता में एक दौर की बैठक भी हो चुकी है। अस्सी घाट पर गंगा की लहरों पर बजड़ों, नावों के झूमर लगाए जाएंगे। लकदक कुर्ता, पायजामा, दुपलिया टोपी के साथ बन ठन कर काशी के लोल बुढ़वा मंगन की संगीत महफिल में पहुंचेंगे। फागुन के आखिरी मंगल को लगने वाली ‘बुढ़वा मंगल’की इस महफिल में इस बार संजीव शंकर और अश्विनी शंकर की शहनाई गूंजेगी। उत्सवों की नगरी काशी में ‘बुढ़वा मंगल’ की नायाब सांस्कृतिक परंपरा रही है।
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1729 में इसकी शुरुआत मीर रुस्तम अली ने की थी। तब काशी नरेश से लेकर आसपास की राज-रियासतों के रजवाड़ों की मोरपंखियों, परियों, हंसों के जोड़ों वाली नावों, शाही बजड़ों के समूहों पर नृत्य-संगीत की महफिलें सजती थीं। उन्हीं नाव-बजड़ों से काशी के रईसों के भी सुसज्जित बजड़े जोड़े जाते थे। गंगा के जलमार्ग पर खाने-पीने की वस्तुओं के साथ मेला लग जाता था। मेहताबी रोशनी में कहीं नृत्य, कहीं गायन तो कहीं साज बजते थे और संगीत रसिकों के समूह उस रस का आनंद उठाते थे। तब यह महफिल रात भर चलती थी।
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