वाराणसी: लावारिस और उधार के शवों के भरोसे हो रही डॉक्टरी की पढ़ाई, बीएचयू में नहीं मिला एक भी देहदानी का शव
आईएमएस बीएचयू में मेडिकल छात्रों की पढ़ाई लावारिस शवों के भरोसे चल रही है। यही हाल वाराणसी के आसपास के जिलों में संचालित मेडिकल अस्पतालों की है।
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वाराणसी, आजमगढ़ और गाजीपुर में एमबीबीएस, एमडी व एमएस की पढ़ाई लावारिस व उधार के शवों के सहारे चल रही है। देहदान का संकल्प लेने वालों की संख्या ज्यादा है, लेकिन संकल्प के सापेक्ष शव नहीं मिल पाते हैं। पुलिस, प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग की मदद से शवों की व्यवस्था की जाती है, फिर पढ़ाई के साथ शोध आगे बढ़ पाता है।
वाराणसी: बीएचयू में देहदानी का शव नहीं मिला
आईएमएस बीएचयू में मेडिकल छात्रों की पढ़ाई लावारिस शवों के भरोसे चल रही है। जिला प्रशासन, पुलिस व स्वास्थ्य विभाग से एनाटमी डिपार्टमेंट को लावारिस शव मिलते हैं। अभी दस शव रखे हैं। बीएचयू में स्नातक प्रथम वर्ष (एमबीबीएस) में 100 सीटें हैं। परास्नातक (एमडी-एमएस) में 188 सीटें हैं।
विभागाध्यक्ष डॉ. आनंद मिश्रा ने बताया कि स्नातक छात्रों की पढ़ाई के लिए हर वर्ष आठ से नौ शवों की जरूरत होती है। इसी तरह परास्नातक के छात्रों की पढ़ाई के लिए हर वर्ष दो से तीन शवों की जरूरत पड़ती है। वर्तमान समय में 10 से शव पड़े हैं। इसे जरूरत के हिसाब से मेडिकल छात्रों को दिया जाता है। शवों को रखने के लिए पूरी प्रकिया अपनाई गई है। डॉ. आनंद ने बताया कि कुछ सीनियर डॉक्टर भी शवों की मदद से शोध करते हैं। सर्जरी व इलाज से जुड़ी जानकारी बढ़ाते हैं।
केमिकल में डूबोकर रखते हैं शव, दो साल तक सुरक्षित
पढ़ाई व शोध के लिए आईएमएस बीएचयू में जो शव रखे जाते हैं, उन्हें इंबार्म किया जाता है। शवों में केमिकल फार्मालीन को इंजेक्ट करते हैं। इससे शव खराब नहीं होते हैं। जब कभी शव बाहर भेजने होते हैं, तब भी इसी केमिकल का इस्तेमाल होता है। शव की इंबाड्री करते हैं। इससे शव एक से दो साल तक खराब नहीं होता है। शव को केमिकल में डूबोकर रखा जाता है ताकि जब जरूरत हो तो उसका उपयोग किया जा सके। हर शव के लिए अलग बॉक्स बनता है।
पहले 72 घंटे डीप फ्रीजर में रखा जाता है शव
उप प्राचार्य प्रोफेसर डॉ नीरज पांडेय ने कहर कि किसी भी शव को नियमानुसार प्राप्त करने के बाद उसे डीप फ्रीजर में 72 घंटे तक रखा जाता है। बाद में सड़न से बचाने के लिए शव को दस लीटर केमिकल में डूबोकर रखा जाता है।
अब तक 300 से ज्यादा ने भरे अंगदान के फार्म
एनाटमी डिपार्टमेंट में अंगदान के लिए भी लोग आते हैं। अब 300 से ज्यादा लोगों ने अंगदान का फार्म भरा है। जो फार्म भरे जाते हैं, उस पर दो लोगों की गवाही भी होती है। हालांकि, जो फार्म भरते हैं, उनसे जुड़े लोग डिपार्टमेंट तक नहीं पहुंचते हैं। विभागीय अधिकारियों का कहना है कि मृत्यु के बाद ही शव मिलते हैं। कई मामले ऐसे होते हैं, जिसमें अंगदान करने वाले व्यक्ति के परिजनों को जानकारी ही नहीं होती है। हाल फिलहाल में अंगदान से संबंधित लोगों के शव मिलने का कोई मामला सामने नहीं आया है।
आईएमएस बीएचयू से आजमगढ़ भेजा जाता है शव
आजमगढ़ के चक्रपानपुर स्थित मेडिकल कॉलेज के छात्रों की पढ़ाई उधार के शवों के भरोसे हैं। आईएमएस बीएचयू से शव भेजा जाता है, फिर छात्र-छात्राएं पढ़ाई करते हैं। वरिष्ठ डॉक्टर शोध को आगे बढ़ाते हैं। देहदान का कोई मामला अब तक सामने नहीं आया है। एमबीबीएस के 100 छात्र-छात्राएं मेडिकल की पढ़ाई कर रहे हैं। प्राचार्य डाॅ. आरपी शर्मा के मुताबिक बीएचयू से शव मिल जा रहे हैं। इससे दिक्कत नहीं आ रही है। हाल में जिलाधिकारी ने सोसायटी गठन करने का निर्देश दिया है। इसका गठन जल्द किया जाएगा। सोसायटी लोगों से संपर्क करके देहदान का संकल्प दिलाएगी। इससे बच्चों की पढ़ाई आसान होगी। लावारिस शवों को भी लिया जाएगा। इसकी व्यवस्था की जा रही है।
गाजीपुर: लावारिस शव ज्यादा, देहदान का संकल्प भी पूरा
गाजीपुर मेडिकल कॉलेज में एमबीबीएस के पहले बैच में सौ छात्र-छात्राएं हैं। उप प्राचार्य प्रोफेसर डॉ नीरज पांडेय बताते हैं कि जिला व पुलिस प्रशासन की मदद से दस लावारिश शव मिले हैं। अब तक एक देहदानी का पार्थिव शरीर मिला है।
माता-पिता का शव दान कर पूरा किया संकल्प
मनिहारी ब्लॉक के खड़वा गांव के रहने वाले समाजसेवी ब्रजभूषण दूबे के पिता मार्कंडेय दुबे ने करीब 15 वर्ष पहले अपने शरीर को मेडिकल कॉलेज के छात्रों के पठन-पाठन के लिए देहदान करने का संकल्प लिया था। इसे उनके निधन होने के बाद बेटे व समाजसेवी ब्रजभूषण दूबे ने पूरा किया था। इससे पहले ब्रजभूषण दूबे की माता का पार्थिव शरीर बीएचयू को दान दिया गया था।