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गुदई महाराज के तबले पर बजता था महादेव का डमरू

Mon, 31 May 2021 01:12 AM IST
Varanasi Bureau वाराणसी ब्यूरो
Updated Mon, 31 May 2021 01:12 AM IST
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Mahadev's damru used to play on Gudai Maharaj's tabla.
भारत रत्न पं. भीमसेन जोशी अक्सर कहते थे कि पं. सामता प्रसाद मिश्र को जब भी सुनता हूं तो महसूस होता है कि महादेव के डमरू का नाद ऐसे ही गूंजता होगा। बनारस घराने के पद्मभूषण पं. सामता प्रसाद मिश्र के तबले का जादू हर किसी के सिर चढ़कर बोला। 18 जुलाई 1921 को जन्में नादब्रह्म के उपासक ने 31 मई 1994 को दुनिया से विदाई ले ली।
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पं. सामता प्रसाद मिश्र जिन्हें कबीरचौरा का बच्चा-बच्चा गुदई महाराज के नाम से जानता था। उन्होंने संगीत कला की नगरी के हर रंग को सहेजा, संजोया, बनारस को जिया और विराट व्यक्तित्व का निर्माण भी किया। पं. मिश्र के पौत्र गौरव मिश्र ने बताया कि दुनिया तो दादा जी के तबले की दीवानी थी। इसी साल प्रयागराज में उन्हें मरणोपरांत गॉड ऑफ तबला की उपाधि से विभूषित किया गया था।
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1950 का वाकया है जिसका जिक्र अक्सर आता है। दादाजी पं. गुदई महाराज का कोलकाता में तबले का कार्यक्रम था। पद्मविभूषण स्वं. पं. जसराज ने पहली बार उनका तबला सुना। दादाजी ने साढ़े छह घंटे तक एकल तबला वादन किया था। पं. जसराज जी तो बस मंत्रमुग्ध होकर सुनते रह गए थे। उन्होंने कहा था ऐसा तबला तो सच में कहीं नहीं सुना। झनक-झनक पायल बाजे में पं. सामता प्रसाद मिश्र ने तबला बजाया और आज भी उसका संगीत हर किसी की जबान पर है।
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गौरव ने बताया कि जिन लोगों ने दादाजी को तबला बजाते देखा था वह कहते हैं कि जब वह तबला लेकर बैठ जाते थे तो साक्षात भगवान के दर्शन होते थे। पद्मविभूषण पं. बिरजू महाराज भी कहते हैं कि तबला बजाने वाले तो बहुत थे लेकिन गुदई चाचा के तबले का टोन लाजवाब था। हम लोग कभी रिहर्सल नहीं करते थे सीधे स्टेज पर ही जुगलबंदी होती थी।

शोले में भी गूंजी गुदई महाराज के तबले की थाप
उत्तर प्रदेश संगीत नाटक अकादमी के अध्यक्ष पद्मश्री प्रो. राजेश्वर आचार्य का कहना है कि गुदई महाराज गुदई महाराज एकदम शुद्ध बनारसी थे। विदेशी दौरे पर भी वह बिना किसी बनावट के बनारसी बोली ही बोलते थे। जहां भी जाते उनके साथ बनारसी रसोई जरूरी होती थी। उन्होंने तबले का जितना प्रयोग फिल्मों में किया था वह आज भी इतिहास ही है। शोले में बसंती का डाकुओं द्वारा पीछा करने के दौरान बैकग्राउंड म्यूजिक में गुदई महाराज का ही तबला था। संगीतकार आरडी बर्मन ने भी गुदई महाराज से संगीत की शिक्षा ली और उनकी कई फिल्मों में गुदई महाराज ने तबला बजाया। इसके अलावा मेरी सूरत तेरी आंखे, झनक झनक पायल बाजे, बसंत बहार जैसी कई फिल्में हैं जिसमें उन्होंने तबले को थाप दी।
सम्मान
पद्मभूषण सम्मान 1991 में, पद्मश्री सम्मान 1987, संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार 1979, प्रेसिडेंट स्कालरशिप 1972 में मिला।
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