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साहित्य लाइवः कवि प्रो. श्रीप्रकाश शुक्ल बोले, साहित्य को जन चेतना से जोड़ने की जरूरत
amarujala.com, presented by रबीश श्रीवास्तव
Updated Wed, 22 Nov 2017 01:18 PM IST
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प्रो. श्रीप्रकाश शुक्ल
- फोटो : अमर उजाला
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‘सब तरह के लोग सब तरफ से सक्रिय हैं/अपनी तरह के लोग अपनी तरफ से निष्क्रिय हैं/मैं क्या करूं/कि अपनी तरह के लोग/अपनी तरफ से सक्रिय हो जाएं/और सब तरह से सुखी रहें...। ’ सबके सुख की चिंता और सबको सुखी रखने के लिए कुछ करने की अकुलाहट यह हमारे दौर के महत्वपूर्ण कवि श्रीप्रकाश शुक्ल की रचनाओं के साथ ही उनके व्यक्तित्व में घुली-मिली है। जीवन और समाज के प्रति रागात्मकता उनकी रचनाओं में झलकती है।
श्रीप्रकाश शुक्ल कहते हैं- ‘साहित्य मुख्यत: मुक्ति का आकांक्षी हुआ करता है। और उसकी मुक्ति के लिए उसे जनता से जुड़ने की जरूरत है। जनसंवाद के माध्यम से साहित्य अपनी अंतरवस्तु को समाज में ले जाता है और भविष्य में परिवर्तन की नींव रखता है।
इस रूप में साहित्य की मुख्य चिंता भविष्य के समतामूलक समाज के निर्माण करने की है। इसके अलावा भोजपुरी भाषा के सर्वांगीण विकास की दिशा में बहुत कुछ काम होना बाकी है। इसके लिए व्यापक जनांदोलन की जरूरत है। प्रस्तुत हैं बीएचयू में भोजपुरी अध्ययन केंद्र के समन्वयक, हिंदी विभाग के प्रो. श्रीप्रकाश शुक्ल के साथ बातचीत के प्रमुख अंश।
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वर्तमान में साहित्य की स्थिति क्या है?
मौजूदा परिवेश में साहित्य अपनी हर विधागत उपलब्धियों में बहुत परिष्कृत और समृद्ध है। समय के साथ नए तेवर और मुहावरे अभिव्यक्ति को नई संरचना देते हैं। इसका सबसे बड़ा प्रमाण साहित्य की प्रमुख विधाओं के समानांतर कथेत्तर गद्य जैसे संस्मरण, जीवनी, यात्रा वृत्तांत जैसी महत्वपूर्ण विधाओं का विकास है। इसने न केवल संवेदना को विस्तार दिया है बल्कि हिंदी भाषा को परिष्कृत किया है। साहित्यिक निजता के दायरे में इसने अपने नए पाठक अर्जित किए हैं।
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श्रीप्रकाश शुक्ल कहते हैं- ‘साहित्य मुख्यत: मुक्ति का आकांक्षी हुआ करता है। और उसकी मुक्ति के लिए उसे जनता से जुड़ने की जरूरत है। जनसंवाद के माध्यम से साहित्य अपनी अंतरवस्तु को समाज में ले जाता है और भविष्य में परिवर्तन की नींव रखता है।
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इस रूप में साहित्य की मुख्य चिंता भविष्य के समतामूलक समाज के निर्माण करने की है। इसके अलावा भोजपुरी भाषा के सर्वांगीण विकास की दिशा में बहुत कुछ काम होना बाकी है। इसके लिए व्यापक जनांदोलन की जरूरत है। प्रस्तुत हैं बीएचयू में भोजपुरी अध्ययन केंद्र के समन्वयक, हिंदी विभाग के प्रो. श्रीप्रकाश शुक्ल के साथ बातचीत के प्रमुख अंश।
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वर्तमान में साहित्य की स्थिति क्या है?
मौजूदा परिवेश में साहित्य अपनी हर विधागत उपलब्धियों में बहुत परिष्कृत और समृद्ध है। समय के साथ नए तेवर और मुहावरे अभिव्यक्ति को नई संरचना देते हैं। इसका सबसे बड़ा प्रमाण साहित्य की प्रमुख विधाओं के समानांतर कथेत्तर गद्य जैसे संस्मरण, जीवनी, यात्रा वृत्तांत जैसी महत्वपूर्ण विधाओं का विकास है। इसने न केवल संवेदना को विस्तार दिया है बल्कि हिंदी भाषा को परिष्कृत किया है। साहित्यिक निजता के दायरे में इसने अपने नए पाठक अर्जित किए हैं।
आपको नहीं लगता है कि साहित्य की उपेक्षा हो रही है?
साहित्य की उपेक्षा..। इस सवाल से इस अर्थ में तो सहमत हूं कि सत्ता, संरचना और साहित्य रचना के बीच ठीक से समन्वय नहीं हो पा रहा है। क्योंकि सत्ता में बैठे लोग साहित्य और विचार से दूर चले गए हैं। इस अर्थ में राजनीति के द्वारा उपेक्षा हो रही है लेकिन समाज में प्रिंट मीडिया के माध्यम से साहित्य अपनी जगह बना रहा है। यही कारण है कि साहित्य में उठने वाले प्रतिरोध की आवाजों को समय-समय पर दबाने की कोशिश की जाती है।
हिंदी साहित्य के उत्थान में काशी का योगदान क्या रहा है?
हिंदी साहित्य और भाषा के उत्थान में काशी का योगदान अप्रतिम है। मध्यकाल में कबीर-तुलसी, रविदास का योगदान तो है ही, आधुनिक काल में भारतेंदू बाबू के बिना न तो हिंदी भाषा और हिंदी साहित्य को याद करना नामुमकिन है। वे तो हिंदी नवजागरण के काशी में अग्रदूत थे। उनके बाद आचार्य रामचंद्र शुक्ल, हजारी प्रसाद द्विवेदी, बाबू श्यामसुंदर दास, नामवर सिंह, शिवप्रसाद सिंह, बेढब बनारसी, धूमिल से लेकर समकालीन प्रसंग में प्रो. काशीनाथ सिंह, ज्ञानेंद्रपति से होते हुए इधर के वर्षों में अपने संस्मरण के लिए प्रो. कुमार पंकज के योगदान को भूला नहीं जा सकता है।
साहित्य की उपेक्षा..। इस सवाल से इस अर्थ में तो सहमत हूं कि सत्ता, संरचना और साहित्य रचना के बीच ठीक से समन्वय नहीं हो पा रहा है। क्योंकि सत्ता में बैठे लोग साहित्य और विचार से दूर चले गए हैं। इस अर्थ में राजनीति के द्वारा उपेक्षा हो रही है लेकिन समाज में प्रिंट मीडिया के माध्यम से साहित्य अपनी जगह बना रहा है। यही कारण है कि साहित्य में उठने वाले प्रतिरोध की आवाजों को समय-समय पर दबाने की कोशिश की जाती है।
हिंदी साहित्य के उत्थान में काशी का योगदान क्या रहा है?
हिंदी साहित्य और भाषा के उत्थान में काशी का योगदान अप्रतिम है। मध्यकाल में कबीर-तुलसी, रविदास का योगदान तो है ही, आधुनिक काल में भारतेंदू बाबू के बिना न तो हिंदी भाषा और हिंदी साहित्य को याद करना नामुमकिन है। वे तो हिंदी नवजागरण के काशी में अग्रदूत थे। उनके बाद आचार्य रामचंद्र शुक्ल, हजारी प्रसाद द्विवेदी, बाबू श्यामसुंदर दास, नामवर सिंह, शिवप्रसाद सिंह, बेढब बनारसी, धूमिल से लेकर समकालीन प्रसंग में प्रो. काशीनाथ सिंह, ज्ञानेंद्रपति से होते हुए इधर के वर्षों में अपने संस्मरण के लिए प्रो. कुमार पंकज के योगदान को भूला नहीं जा सकता है।
वर्तमान परिदृश्य में युवा साहित्यकारों की भूमिका क्या हो?
जहां तक युवा साहित्यकारों की भूमिका की बात है तो काशी में रामाज्ञा शशिधर, व्योमेश शुक्ल से लेकर कुमार मंगलम, जगन्नाथ दूबे, शिवकुमार और विंध्याचल यादव जैसी युवा पीढ़ी के रचनाकार सक्रिय हैं। लिखने-पढ़ने के साथ ही साहित्यिक आयोजनों और आंदोलनों में सक्रिय रहते हैं। नई पीढ़ी के लेखकों को अपनी पारंपरिक विरासत को संभालते हुए आधुनिक मनोजगत से जुड़ने की जरूरत है। कई बार देखा जाता है कि पारंपरिक प्रतीकों की उपेक्षा और अवमानना से भी साहित्य समाज से कट जाता है। नई पीढ़ी को इस दृष्टि से भी सचेत रहने की जरूरत है।
आप भोजपुरी अध्ययन केंद्र के समन्वयक हैं। भोजपुरी साहित्य की स्थिति क्या है?
भोजपुरी का वर्तमान परिदृश्य बहुत सक्षम और समृद्ध है। इसमें अब मौखिक से आगे बढ़कर लिखित साहित्य उपलब्ध है। साहित्य की हर विधा में कविता, कहानी, उपन्यास, निबंध, यात्रा संस्मरण में इसने प्रगति की है। विश्व पटल पर भी भोजपुरी ने अपनी पहचान बनाई है। और देखा जाए तो भारत की अकेली देशज भाषा है जिसने दुनिया में पहचान बनाई है। लेकिन संवैधानिक संरक्षण न मिलने की वजह से इस भाषा में काम करने वाले लोग किंचित निराश और उदास हैं। इसलिए जरूरी है इसे आठवीं अनुसूची में शामिल करते हुए इसके बृहत्तर विकास के लिए शासन द्वारा मार्ग प्रशस्त किया जाए।
जहां तक युवा साहित्यकारों की भूमिका की बात है तो काशी में रामाज्ञा शशिधर, व्योमेश शुक्ल से लेकर कुमार मंगलम, जगन्नाथ दूबे, शिवकुमार और विंध्याचल यादव जैसी युवा पीढ़ी के रचनाकार सक्रिय हैं। लिखने-पढ़ने के साथ ही साहित्यिक आयोजनों और आंदोलनों में सक्रिय रहते हैं। नई पीढ़ी के लेखकों को अपनी पारंपरिक विरासत को संभालते हुए आधुनिक मनोजगत से जुड़ने की जरूरत है। कई बार देखा जाता है कि पारंपरिक प्रतीकों की उपेक्षा और अवमानना से भी साहित्य समाज से कट जाता है। नई पीढ़ी को इस दृष्टि से भी सचेत रहने की जरूरत है।
आप भोजपुरी अध्ययन केंद्र के समन्वयक हैं। भोजपुरी साहित्य की स्थिति क्या है?
भोजपुरी का वर्तमान परिदृश्य बहुत सक्षम और समृद्ध है। इसमें अब मौखिक से आगे बढ़कर लिखित साहित्य उपलब्ध है। साहित्य की हर विधा में कविता, कहानी, उपन्यास, निबंध, यात्रा संस्मरण में इसने प्रगति की है। विश्व पटल पर भी भोजपुरी ने अपनी पहचान बनाई है। और देखा जाए तो भारत की अकेली देशज भाषा है जिसने दुनिया में पहचान बनाई है। लेकिन संवैधानिक संरक्षण न मिलने की वजह से इस भाषा में काम करने वाले लोग किंचित निराश और उदास हैं। इसलिए जरूरी है इसे आठवीं अनुसूची में शामिल करते हुए इसके बृहत्तर विकास के लिए शासन द्वारा मार्ग प्रशस्त किया जाए।