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खुसुर-फुसुर छोड़िए, ‘उन दिनों’ पर बेझिझक बोलिए

Fri, 28 May 2021 01:43 AM IST
Varanasi Bureau वाराणसी ब्यूरो
Updated Fri, 28 May 2021 01:43 AM IST
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Leave it to yourself, feel free to say 'those days'
घरेलू हिंसा और अपराध के खिलाफ आवाज बुलंद करने वाली महिलाओं को अब सेहत के प्रति भी मजबूत होना पड़ेगा। समाज की कई समस्याओं पर खुलकर बोलने वाली महिलाएं आखिर कब तक अपनी बेटियों, बहुओं की मासिक परेशानी को दबाती या छिपाती रहेंगी। अब खुसुर-फुसुर करने का नहीं, बल्कि खुलकर बोलने का वक्त है। परिवार और समाज के सामने महिलाओं को अपने निजी स्वास्थ्य पर संवाद करना होगा। ऐसा ही कदम उठाया है शहर की विभिन्न संस्थाओं ने। यह संस्थाएं महिलाओं के उन मुश्किल दिनों की सेहत और सफाई पर काम करने के साथ शहर, गांव और कस्बों में जाकर उन्हें जागरूक करती हैं। मुहिम संस्था की संस्थापक स्वाति सिंह कहती हैं एक वर्जित विषय पर किसी महिला के बोलने की उम्मीद भी नहीं कर सकते। मैंने जब इस पर काम शुरू किया तो समाज के तानों का सामना करना पड़ा, लेकिन आज कई ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाओं के साथ पुरुषों की भी सोच बदली है।
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अपने साथ पर्यावरण सुरक्षा जरूरी
स्त्री एवं प्रसूति रोग विशेषज्ञ डॉ. शिप्रा धर बताती हैं कि सफाई नहीं रखने से महिलाएं सर्वाइकल कैंसर व अन्य रोगों की शिकार हो जाती हैं। केले के पैड का फाइबर, वुडन पल्प, पाइन और दूसरे प्राकृतिक अवशोषकों से बने पैड आसानी से गलते हैं, जो महिला व प्रकृति दोनों की सेहत के लिए अच्छे हैं।
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जागरूकता का अभाव
सखी, पैड बैंक की सुनीता भार्गव का कहना है कि जागरूकता के अभाव में आज भी कई महिलाएं कपड़े का इस्तेमाल करती हैं। जिसे धोकर और छिपाकर सुखाने के चक्कर में खुली हवा व धूप तक नहीं लगने देतीं। कपड़ा नहीं, पैड इस्तेमाल करें। हर 6-8 घटें में इसे बदलें।
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रंग लाया प्रयास
लखनऊ में जन्मी कोमल जागरूकता लाने की दिशा में काफी काम कर चुकी हैं। चंदौली की ये बहू अब काशी में रहकर अपनी मुहिम के जरिए महिलाओं के ‘उन दिनों को’ अच्छे दिन में बदलने की कोशिश कर रहीं हैं। पति के जाने के बाद कोमल ने महिलाओं की पीड़ा को अपने जीवन का मकसद बना लिया। 2018 में इस मुद्दे पर ससुराल के आसपास के गांवों में बात की तो विरोध शुरू हो गया। लेकिन हार नहीं मानी और सेवन डेज फाउंडेशन की स्थापना की। कुछ लड़कियों को जोड़ा और उनकी निजी समस्याओं पर चर्चा की। मुहिम में अब 20 महिलाएं जुड़ चुकी हैं। बनारस, चंदौली सहित मिर्जापुर व अन्य जिलों में भी इस मुहिम को लेकर गईं। स्कूलों में छात्राओं को जागरूक करने के साथ गांवों में भी अभियान चला रहीं है। खास बात यह है कि कोमल ने महिलाओं के लिए ऑर्गेनिक सेनेटरी पैड बनाने की शुरुआत कर दी है। कोमल ने बताया कि मासिक धर्म के दौरान महिलाओं की सोच बदलने की छोटी से कोशिश है। महिलाओं, लड़कियों को पैड वितरित करते हैं और इसके निस्तारण का तरीका बताते हैं।
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