{"_id":"68cd4c3680be48ca1c02a89e","slug":"lal-bahadur-shastri-first-visited-to-meet-maharaja-of-varanasi-dr-vibhuti-narayan-after-becoming-pm-2025-09-19","type":"story","status":"publish","title_hn":"काशी के पूर्वज: पीएम बनने के बाद सबसे पहले काशी नरेश डॉ. विभूति नारायण से मिलने पहुंचे थे लाल बहादुर शास्त्री","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
काशी के पूर्वज: पीएम बनने के बाद सबसे पहले काशी नरेश डॉ. विभूति नारायण से मिलने पहुंचे थे लाल बहादुर शास्त्री
Fri, 19 Sep 2025 05:57 PM IST
प्रगति चंद
अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी।
अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी।
Published by: प्रगति चंद
Updated Fri, 19 Sep 2025 05:57 PM IST
सार
लाल बहादुर शास्त्री के पौत्र विभाकर शास्त्री ने कहा कि मेरे दादा पीएम बनने से पहले यूपी में पुलिस मंत्री हुआ करते थे। जनता प्रदर्शन कर रही थी। उन्होंने लाल बहादुर शास्त्री से जुड़ी रोचक जानकारी दी।
विज्ञापन
लाल बहादुर शास्त्री
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
लाल बहादुर शास्त्री के पौत्र विभाकर शास्त्री ने बताया कि मेरे दादा पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की जब मौत हुई थी उस समय मैं एक साल का था। हम उनके जीवन की प्रेरणास्रोत बातें सुनकर बड़े हुए। आज भी त्योहार पर जब सभी परिवार के सदस्य एकत्र होते हैं तो दादा जी की बातें होती हैं। पिताजी और चाचाजी हम लोगों को उनके बारे में बताते थे।
विज्ञापन
पीएम बनने के बाद जब शास्त्री जी रामनगर आए तो अपनी परंपराओं को नहीं भूले। जब चौक पर काफिला रुका तो सभी सुरक्षाकर्मियों को रोक कर सीधे सबसे पहले वे किले में काशी नरेश डॉ. विभूति नारायण सिंह से मिलने पहुंचे। वहां से पैदल ही घर आए। उनके चाचा काली प्रसाद और किशोरी लाल ने दरवाजे पर अगवानी की थी।
विज्ञापन
घर आते ही उन्होंने सत्यनारायण भगवान की कथा सुनी। पंडित जी प्रसाद देने आगे बढ़े तो सुरक्षाकर्मियों ने रोका, शास्त्री जी ने कहा कि यह मेरा घर है, यहां चिंता की बात नहीं है। इसी दौरान पड़ोसी राजनारायण लाल मुलाकात के लिए आ गए। उन्होंने दादाजी से कहा, शास्त्री जी अब तो अपना मकान बनवा लीजिए। उन्होंने साफ कहा, मेरा घर अभी बहुत अच्छा है। मेरे देश की अधिकांश जनता के पास तो झोपड़ियां ही हैं। पहले उनके मकान बन जाएं फिर अपने मकान के बारे में सोचूंगा।
विज्ञापन
मेरे दादा पीएम बनने से पहले यूपी में पुलिस मंत्री हुआ करते थे। जनता प्रदर्शन कर रही थी। तत्कालीन मुख्यमंत्री गोविंद बल्लभ पंत ने लाठीचार्ज की बात कही तो शास्त्री जी ने इसकी जानकारी ली। पहली बार लोगों पर पानी के बौछार कर भीड़ को हटवाने की शुरुआत की थी। उनका कहना था कि हम अपने लोगों पर लाठी नहीं चला सकते।
बापू के बाद जब दादा ने अपनी पढ़ाई छोड़कर आंदोलन में भाग लेने की बात अपने परिवार को बताई तो वे इसके खिलाफ हो गए। उनकी मां ने इस कदम को अपनी उम्मीदों को तोड़ने वाला बताया। परिवार के लोगों ने भी शास्त्री जी के निर्णय को गलत बताते हुए उन्हें रोकने का प्रयास किया। लेकिन, सभी को पता था कि एक बार मन बना लेने के बाद वे अपना निर्णय कभी नहीं बदलेंगे।
शास्त्री जी की शादी उनके ननिहाल यानी मिर्जापुर की ललिता देवी से हुई थी। दहेज के नाम पर एक चरखा और हाथ से बुने हुए कुछ मीटर कपड़े मिले थे। वे दांडी यात्रा के बाद सात साल जेल में रहे। इस प्रतीकात्मक संदेश ने पूरे देश में एक तरह की क्रांति ला दी। दादा जी नई ऊर्जा के साथ स्वतंत्रता के इस संघर्ष में शामिल हो गए। उन्होंने कई विद्रोही अभियानों का नेतृत्व किया। सात साल तक जेल में रहे।