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रिपोर्ट के इंतजार में झुकते जा रहे काशी विश्वनाथ मंदिर के स्वर्ण शिखर
न्यूज डेस्क,अमर उजाला,वाराणसी
Updated Sun, 02 Sep 2018 10:21 AM IST
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श्री काशी विश्वनाथ मंदिर
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श्री काशी विश्वनाथ मंदिर के स्वर्ण शिखर तेजी से झुक रहा है। इसका कारण गर्भगृह में एक दशक से बारिश के मौसम में पानी रिसने और दीवारों में नमी के कारण पत्थरों का क्षरण होना है। यही नहीं, 241 साल से मंदिर का जीर्णोद्धार नहीं हुआ है। इसके चलते गुंबदों के पत्थरों में भी क्षरण हो रहा है और स्वर्ण शिखर के बीच भी काफी जगह खाली हो चुकी है।
बताया जाता है कि मंदिर प्रबंधन ने 1999-2000 में स्वर्ण शिखरों की साफ-सफाई के लिए साढ़े सात लाख रुपये का ठेका दिया गया। उस समय केमिकल और ज्वलनशील पदार्थों से सफाई करने के कारण सोने के पत्तरों में दूरियां बढ़ गईं। इससे बारिश का पानी सोने के पत्तरों से अंदर जाकर पत्थरों को नुकसान पहुंचने के साथ ही रिसने लगा।
स्वर्ण शिखरों की मरम्मत के लिए बीएचयू और केंद्रीय भवन अनुसंधान संस्थान (सीबीआरआई), रुड़की के विशेषज्ञों ने 2015 में जांच-पड़ताल की थी लेकिन लगभग 65 लाख रुपये के खर्च और तीन साल बाद भी इसकी अंतिम रिपोर्ट मंदिर प्रशासन को नहीं दी है।
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अंतरिम रिपोर्ट में कहा गया था कि मंदिर के स्वर्ण शिखर और गुंबद के बीच लगाए गए लकड़ी के टांके खराब हो चुके हैं। इससे स्वर्ण शिखरों में झुकाव आ रहा है। 2016 में मंदिर के वास्तु सलाहकार राजपाल कौशिक ने भी शिखरों के झुकने की बात कही थी। अंतिम रिपोर्ट नहीं मिलने का मामला हाल में हुई न्यास परिषद की 95वीं बैठक में भी उठाया गया है।
न्यास परिषद के अध्यक्ष आचार्य अशोक द्विवेदी का कहना है कि 241 वर्ष बाद से मंदिर के शिखर और गर्भगृह की खास मरम्मत नहीं हुई है। तब से अब तक गर्भगृह और उसके आसपास के फर्श की मरम्मत कराने के अलावा कुछ पत्थर ही बदले गए हैं।
मंदिर का जीर्णोद्धार 1775-77 में इंदौर की महारानी अहिल्याबाई होल्कर ने कराया था। सन 1839 में लाहौर के महाराजा रणजीत सिंह ने मंदिर के दो शिखरों पर करीब 22 मन सोना चढ़वाया था।
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बताया जाता है कि मंदिर प्रबंधन ने 1999-2000 में स्वर्ण शिखरों की साफ-सफाई के लिए साढ़े सात लाख रुपये का ठेका दिया गया। उस समय केमिकल और ज्वलनशील पदार्थों से सफाई करने के कारण सोने के पत्तरों में दूरियां बढ़ गईं। इससे बारिश का पानी सोने के पत्तरों से अंदर जाकर पत्थरों को नुकसान पहुंचने के साथ ही रिसने लगा।
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स्वर्ण शिखरों की मरम्मत के लिए बीएचयू और केंद्रीय भवन अनुसंधान संस्थान (सीबीआरआई), रुड़की के विशेषज्ञों ने 2015 में जांच-पड़ताल की थी लेकिन लगभग 65 लाख रुपये के खर्च और तीन साल बाद भी इसकी अंतिम रिपोर्ट मंदिर प्रशासन को नहीं दी है।
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अंतरिम रिपोर्ट में कहा गया था कि मंदिर के स्वर्ण शिखर और गुंबद के बीच लगाए गए लकड़ी के टांके खराब हो चुके हैं। इससे स्वर्ण शिखरों में झुकाव आ रहा है। 2016 में मंदिर के वास्तु सलाहकार राजपाल कौशिक ने भी शिखरों के झुकने की बात कही थी। अंतिम रिपोर्ट नहीं मिलने का मामला हाल में हुई न्यास परिषद की 95वीं बैठक में भी उठाया गया है।
न्यास परिषद के अध्यक्ष आचार्य अशोक द्विवेदी का कहना है कि 241 वर्ष बाद से मंदिर के शिखर और गर्भगृह की खास मरम्मत नहीं हुई है। तब से अब तक गर्भगृह और उसके आसपास के फर्श की मरम्मत कराने के अलावा कुछ पत्थर ही बदले गए हैं।
मंदिर का जीर्णोद्धार 1775-77 में इंदौर की महारानी अहिल्याबाई होल्कर ने कराया था। सन 1839 में लाहौर के महाराजा रणजीत सिंह ने मंदिर के दो शिखरों पर करीब 22 मन सोना चढ़वाया था।
148 भवनों के अधिग्रहण की तैयारी
मंदिर परिक्षेत्र
श्री काशी विश्वनाथ विशिष्ट क्षेत्र विकास परिषद मंदिर परिक्षेत्र के विकास के लिए और भवनों के अधिग्रहण की तैयारी शुरू हो गई है। विकास परिषद परिक्षेत्र के विकास के लिए बचे हुए 148 भवनों के अधिग्रहण का प्रस्ताव शासन को भेजा जाएगा।
विधान मंडल के दोनों सदनों में विशिष्ट क्षेत्र विकास परिषद के गठन का विधेयक पारित होने के बाद काशी विश्वनाथ कॉरिडोर के विकास कार्यों के लिए तेजी आ गई है। मुख्यमंत्री ने पिछले दौरे पर मंदिर के विकास कार्यों की धीमी गति पर नाराजगी जताई थी।
विशिष्ट क्षेत्र विकास परिषद के सदस्य सचिव विशाल सिंह ने बताया कि मंदिर परिक्षेत्र के विस्तारीकरण के लिए भवनों की रजिस्ट्री समय से पूरी नहीं होने के कारण यह निर्णय लिया गया है। मंजूरी मिलते ही अधिग्रहण की कार्रवाई शुरू हो जाएगी। बचे हुए भवनों को अब भू अधिग्रहण अधिनियम 2013 के तहत अधिग्रहीत किया जाएगा।
योजना के तहत मंदिर क्षेत्र के विस्तार के लिए दशाश्वमेध और गढ़वासी टोला वार्डों में पड़ने वाले भूमि व भवनों को अधिगृहीत कर उनका भी विकास किया जाना है। वित्तीय वर्ष 2017-18 में इस पर करीब 40 करोड़ रुपये खर्च किए जा चुके हैं।
चालू वित्तीय वर्ष में करीब 150 करोड़ रुपये खर्च होने हैं। मंदिर परिक्षेत्र में चिह्नित 15 मोहल्लों में परिषद के आदेश के अनुसार ही विकास कार्य कराए जाएंगे। भवनों का अधिग्रहण पूरा होने के बाद कॉरिडोर के काम में भी तेजी आएगी।
विशिष्ट क्षेत्र में लाहौरी टोला, धर्मकूप, मीरघाट, त्रिपुरा भैरवी, रानी भवानी गली, शकरकंद गली, कालिका गली, साक्षी विनायक, कोतवालपुरा, पठानी टोला, मणिकर्णिका, ब्रह्मनाल, पांचो पंड्वा और ज्ञानवापी मोहल्ले शामिल हैं।
विधान मंडल के दोनों सदनों में विशिष्ट क्षेत्र विकास परिषद के गठन का विधेयक पारित होने के बाद काशी विश्वनाथ कॉरिडोर के विकास कार्यों के लिए तेजी आ गई है। मुख्यमंत्री ने पिछले दौरे पर मंदिर के विकास कार्यों की धीमी गति पर नाराजगी जताई थी।
विशिष्ट क्षेत्र विकास परिषद के सदस्य सचिव विशाल सिंह ने बताया कि मंदिर परिक्षेत्र के विस्तारीकरण के लिए भवनों की रजिस्ट्री समय से पूरी नहीं होने के कारण यह निर्णय लिया गया है। मंजूरी मिलते ही अधिग्रहण की कार्रवाई शुरू हो जाएगी। बचे हुए भवनों को अब भू अधिग्रहण अधिनियम 2013 के तहत अधिग्रहीत किया जाएगा।
योजना के तहत मंदिर क्षेत्र के विस्तार के लिए दशाश्वमेध और गढ़वासी टोला वार्डों में पड़ने वाले भूमि व भवनों को अधिगृहीत कर उनका भी विकास किया जाना है। वित्तीय वर्ष 2017-18 में इस पर करीब 40 करोड़ रुपये खर्च किए जा चुके हैं।
चालू वित्तीय वर्ष में करीब 150 करोड़ रुपये खर्च होने हैं। मंदिर परिक्षेत्र में चिह्नित 15 मोहल्लों में परिषद के आदेश के अनुसार ही विकास कार्य कराए जाएंगे। भवनों का अधिग्रहण पूरा होने के बाद कॉरिडोर के काम में भी तेजी आएगी।
विशिष्ट क्षेत्र में लाहौरी टोला, धर्मकूप, मीरघाट, त्रिपुरा भैरवी, रानी भवानी गली, शकरकंद गली, कालिका गली, साक्षी विनायक, कोतवालपुरा, पठानी टोला, मणिकर्णिका, ब्रह्मनाल, पांचो पंड्वा और ज्ञानवापी मोहल्ले शामिल हैं।