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काशी की पेयजल समस्या के पीछे असि की बर्बादी
ब्यूरो/अमर उजाला, वाराणसी
Updated Thu, 21 Apr 2016 02:23 AM IST
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गंगा में बहता नगवां नाला का पानी।
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असि नदी के पुनरुद्धार का मुद्दा तीर्थनगरी काशी की 22 लाख की आबादी के जीवन से सीधे तौर पर जुड़ा है। नाले में तब्दील असि नदी को नगवा के पास गंगा में बहाए जाने की वजह से पेयजल की बड़ी समस्या पैदा हो गई है। भदैनी इनटेक वाटर पंप से महज 600 मीटर दक्षिण नगवा में बहाए जा रहे असि के अवजल को ही गंगाजल के साथ पंपिंग सिस्टम से खींच कर पेयजल के रूप में दिया जा रहा है। दरअसल इस दूषित जल को शोधित कर पेयजल के रूप में परिवर्तित करने की फिलहाल जलकल विभाग के पास कोई कारगर तकनीक नहीं है। ऐसे में भोले की नगरी के आस्थावान लोगों की प्यास बुझाने के लिए दूषित जल की आपूर्ति की जा रही है। इस तरह की जानलेवा पेयजल प्रणाली से जलापूर्ति करने के एवज में झेंपने की बजाए जलकल विभाग (नगर निगम) जनता से उल्टा जलकर वसूल कर रहा है।
प्राचीन नगरी वाराणसी की पहचान असि नदी की व्यवस्था चौपट होने से सर्वाधिक चोट भूमिगत जल स्रोतों को पहुंची है। कंदवा, कंचनपुर ताल ही कचरे से नहीं पटे, इस नदी को रिचार्ज करने वाले पुष्कर तालाब और कुरुक्षेत्र तालाब समेत दर्जनों तालाबों को भी दूषित कर दिया गया। असि में डीरेका के अलावा बीएचयू के सर सुंदर लाल अस्पताल और परिसर की गंदगी के साथ ही सौ से अधिक नर्सिंग होम, पांच सौ से अधिक साड़ी कारखाने के अलावा 66 से अधिक कॉलोनियों का गंदा पानी असि नदी में बहाया जा रहा है। शहर के जल स्रोतों और सीवर व्यवस्था पर लंबे समय से काम कर रहे रमेश चोपड़ा का कहना है कि करीब नौ करोड़ लीटर रासायनिक और मेडिकल कचरा असि नदी के जरिए नगवा के पास प्रतिदिन गंगा में गिराया जा रहा है।
नगवा नाले से गंगा में छोड़ा जाने वाला बड़ी मात्रा में अवजल भदैनी इनटेक वाटर पंप से जलापूर्ति के लिए उठाया जा रहा है। गंगाजल में असि नदी के जरिए मिलने वाले विषाक्त रसायनों के शोधन की कोई तकनीक जलकल विभाग के पास नहीं है। इससे पूरे शहर में गंदे पानी की आपूर्ति की जा रही है। घरों की टोटियों में दुर्गंधयुक्त पानी आ रहा है और लोग वही पानी पी रहे हैं। केमिकल इंजीनियर प्रो. आरएस दुबे के मुताबिक जल कल विभाग सीवरयुक्त पानी की आपूर्ति कर रहा है। इस पर रोक नहीं लगी तो बनारस में बड़ी बीमारी फैल जाएगी।
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प्राचीन नगरी वाराणसी की पहचान असि नदी की व्यवस्था चौपट होने से सर्वाधिक चोट भूमिगत जल स्रोतों को पहुंची है। कंदवा, कंचनपुर ताल ही कचरे से नहीं पटे, इस नदी को रिचार्ज करने वाले पुष्कर तालाब और कुरुक्षेत्र तालाब समेत दर्जनों तालाबों को भी दूषित कर दिया गया। असि में डीरेका के अलावा बीएचयू के सर सुंदर लाल अस्पताल और परिसर की गंदगी के साथ ही सौ से अधिक नर्सिंग होम, पांच सौ से अधिक साड़ी कारखाने के अलावा 66 से अधिक कॉलोनियों का गंदा पानी असि नदी में बहाया जा रहा है। शहर के जल स्रोतों और सीवर व्यवस्था पर लंबे समय से काम कर रहे रमेश चोपड़ा का कहना है कि करीब नौ करोड़ लीटर रासायनिक और मेडिकल कचरा असि नदी के जरिए नगवा के पास प्रतिदिन गंगा में गिराया जा रहा है।
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नगवा नाले से गंगा में छोड़ा जाने वाला बड़ी मात्रा में अवजल भदैनी इनटेक वाटर पंप से जलापूर्ति के लिए उठाया जा रहा है। गंगाजल में असि नदी के जरिए मिलने वाले विषाक्त रसायनों के शोधन की कोई तकनीक जलकल विभाग के पास नहीं है। इससे पूरे शहर में गंदे पानी की आपूर्ति की जा रही है। घरों की टोटियों में दुर्गंधयुक्त पानी आ रहा है और लोग वही पानी पी रहे हैं। केमिकल इंजीनियर प्रो. आरएस दुबे के मुताबिक जल कल विभाग सीवरयुक्त पानी की आपूर्ति कर रहा है। इस पर रोक नहीं लगी तो बनारस में बड़ी बीमारी फैल जाएगी।
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