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आए बिहार में तो इज्जत चली गई...
ब्यूरो/अमर उजाला, वाराणसी
Updated Mon, 16 Nov 2015 01:55 AM IST
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बेनियाबाग के मैदान में रविवार की रात इंडो-पाक मुशायरे में नफरतों को दूर करने और मोहब्बतों को बांटने के साथ ही मुल्क में कौमी एकता का पैगाम देने वाली गजलें पढ़ी गईं। सियासी चालें, बिहार चुनाव, महंगाई और अच्छे दिनों के वादे पर भी खूब शेर पढ़े गए।
पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की याद में आयोजित मुशायरे का आगाज इस शेर के साथ हुआ कि-हम खून की किश्तें कई दे चुके लेकिन/ऐ मुल्क आखिर कर्ज अदा क्यों नहीं होता...। खचाखच भीड़ के बीच मुशायरे की शुरुआत हुई निजाम बनारसी के नातिया कलाम से।
उनके शेर इस तरह थे-मुसलसल वो जुल्मों सितम कर रहे हैं/नबी फिर भी उन पर करम कर रहे हैं...। इनके बाद मुश्ताक बनारसी ने माइक संभाला। उन्होंने पढ़ा कि-इस तरह रस्मे मुहब्बत की निभाई जाए/ईद की तरह से होली मनाई जाए...। फिर बारी आई आफताब हुनर की।
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उनके शेर पर तालियों की बौछार होने लगी। उनके शेर इस तरह था- तीरगी हर तरफ जुल्फें बिखर जाने के बाद/चांद सा चेहरा दिखा गेशू संवर जाने के बाद...। रात चढ़ने के साथ तरन्नुम का अंदाज भी बदलने लगा। संचालक ने फिर जनाब हाशिम नोमानी को आवाज दी।
उन्होंने शेर इस अंदाज में पढ़ा-रफ्ता -रफ्ता जुल्म भी सहने के आदी हो गए/ और वो कहते हैं हम आतंकवादी हो गए...। इनके बाद शोला टांडवी ने मुशायरे का पूरा मिजाज ही बदल दिया। उन्होंने अच्छे दिनों के वादे पर चुटकी लेने के साथ ही बिहार चुनाव पर भी शेर अर्ज किया।
उनके नज्म की पंक्तियां इस तरह थीं- हाकिम चले और हुकूमत चली गई/ आए बिहार में वहीं इज्जत चली गई। मंच पर दुबई से आए शायर डॉ. जुबैर फारुख अलअर्सी, नेपाल के जाहिद आजाद, सुहैल उस्मानी, अना देहलवी, साइस्ता सना को सुनने के इंतजार में भीड़ डटी रही।
इससे पहले संयोजक अशफाक मेमन ने शायरों का अदब के साथ खैर मकदम किया। उद्घाटन कांग्रेस के वरिष्ठ नेता प्रमोद तिवारी ने किया। उन्होंने कहा कि हुकूमतें हिंदू-मुसलमान को बांटकर बनाई जा रही हैं। लेकिन बांटने वाले खुद टूट जाएंगे, मुल्क नहीं टूटेगा।
जब मुल्क आजाद हुआ था तब सरदार भगत सिंह के साथ अशफाक उल्ला खान ने भी फांसी के फंदे को चूमा था। इस मौके पर अल्पसंख्यक आयोग के अध्यक्ष शकील अहमद बब्लू, एडिशनल एडवोकेट जनरल कमरुल हसन सिद्दीकी समेत तमाम लोग उपस्थित थे।
संचालन नदीम फरुख ने किया। मुख्य अतिथि प्रमोद तिवारी ने डॉ. जुबैर फारूख अल अर्शी के गजल संग्रह ‘एकता का चिराग’ पार्ट टू और पार्ट थ्री का विमोचन भी किया। यह संग्रह राजीव गांधी को समर्पित है।
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पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की याद में आयोजित मुशायरे का आगाज इस शेर के साथ हुआ कि-हम खून की किश्तें कई दे चुके लेकिन/ऐ मुल्क आखिर कर्ज अदा क्यों नहीं होता...। खचाखच भीड़ के बीच मुशायरे की शुरुआत हुई निजाम बनारसी के नातिया कलाम से।
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उनके शेर इस तरह थे-मुसलसल वो जुल्मों सितम कर रहे हैं/नबी फिर भी उन पर करम कर रहे हैं...। इनके बाद मुश्ताक बनारसी ने माइक संभाला। उन्होंने पढ़ा कि-इस तरह रस्मे मुहब्बत की निभाई जाए/ईद की तरह से होली मनाई जाए...। फिर बारी आई आफताब हुनर की।
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उनके शेर पर तालियों की बौछार होने लगी। उनके शेर इस तरह था- तीरगी हर तरफ जुल्फें बिखर जाने के बाद/चांद सा चेहरा दिखा गेशू संवर जाने के बाद...। रात चढ़ने के साथ तरन्नुम का अंदाज भी बदलने लगा। संचालक ने फिर जनाब हाशिम नोमानी को आवाज दी।
उन्होंने शेर इस अंदाज में पढ़ा-रफ्ता -रफ्ता जुल्म भी सहने के आदी हो गए/ और वो कहते हैं हम आतंकवादी हो गए...। इनके बाद शोला टांडवी ने मुशायरे का पूरा मिजाज ही बदल दिया। उन्होंने अच्छे दिनों के वादे पर चुटकी लेने के साथ ही बिहार चुनाव पर भी शेर अर्ज किया।
उनके नज्म की पंक्तियां इस तरह थीं- हाकिम चले और हुकूमत चली गई/ आए बिहार में वहीं इज्जत चली गई। मंच पर दुबई से आए शायर डॉ. जुबैर फारुख अलअर्सी, नेपाल के जाहिद आजाद, सुहैल उस्मानी, अना देहलवी, साइस्ता सना को सुनने के इंतजार में भीड़ डटी रही।
इससे पहले संयोजक अशफाक मेमन ने शायरों का अदब के साथ खैर मकदम किया। उद्घाटन कांग्रेस के वरिष्ठ नेता प्रमोद तिवारी ने किया। उन्होंने कहा कि हुकूमतें हिंदू-मुसलमान को बांटकर बनाई जा रही हैं। लेकिन बांटने वाले खुद टूट जाएंगे, मुल्क नहीं टूटेगा।
जब मुल्क आजाद हुआ था तब सरदार भगत सिंह के साथ अशफाक उल्ला खान ने भी फांसी के फंदे को चूमा था। इस मौके पर अल्पसंख्यक आयोग के अध्यक्ष शकील अहमद बब्लू, एडिशनल एडवोकेट जनरल कमरुल हसन सिद्दीकी समेत तमाम लोग उपस्थित थे।
संचालन नदीम फरुख ने किया। मुख्य अतिथि प्रमोद तिवारी ने डॉ. जुबैर फारूख अल अर्शी के गजल संग्रह ‘एकता का चिराग’ पार्ट टू और पार्ट थ्री का विमोचन भी किया। यह संग्रह राजीव गांधी को समर्पित है।