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आजमगढ़ के इस गांव में हिंदू भी मनाते हैं मोहर्रम, 250 वर्षों से चली आ रही ताजिया निकालने की परंपरा

Fri, 21 Sep 2018 11:11 AM IST
न्यूज डेस्क,अमर उजाला,आजमगढ़
न्यूज डेस्क,अमर उजाला,आजमगढ़ Updated Fri, 21 Sep 2018 11:11 AM IST
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Hindus also celebrate moharram in this village of azamgarh
निकाली गई ताजिया - फोटो : amar ujala
यूपी के आजमगढ़ में एक ऐसा गांव है जहां पर हिंदू भी मोहर्रम मनाते हैं। इसके साथ ही हिंदू ताजिया भी निकालते हैं। गांव में यह परंपरा 250 वर्षों से चल रही है। यहां का ताजिया इतना मशहूर है कि लोग दूर-दूर से मोहर्रम पर ताजिए का जुलूस देखने आते हैं।
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जिले में डोरवा गांव की चौहान बस्ती के लोग करीब 250 वर्षों से मोहर्रम मनाकर सांपद्रिायक सौहार्द की मिशाल पेश कर रहे हैं। बताते हैं कि यहां ताजिया बनाने के लिए चार सोने के झूमर और सोलह किग्रा चांदी की कलशी सिंगापुर से मंगाई गई थी, जो आज भी मौजूद है। ताजिया बनाने में इसका प्रयोग किया जाता है।
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ताजिया रखने के लिए इमामबाड़ा भी बनाया गया है। जहां 200 साल पुराना तंबू भी मौजूद है। जिसे रामदीन ने अन्य सहयोगियों के साथ मिलकर छह महीने में तैयार किया था। मोहर्रम के समय इसका प्रयोग किया जाता है। ताजिया पूरे क्षेत्र में घुमाया जाता है।
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डोरवा के चौहान बस्ती और सुंदर सराय बल्लो के पठान लोगों के ताजिया का मिलन होता है। सुंदर सराय बल्लो स्थित कर्बला के मैदान में ताजिए को दफनाया जाता है। वहीं पर मोहर्रम के समय गांव के जितने भी लोग बाहर रोजगार के लिए गए होते हैं, वह भी घर आते हैं। प्रसाद के रुप के में मलीदा बनाकर वितरण किया जाता है। पूरे मोहर्रम ढोला ताशा बजाया जाता है। जिसमें बढ़ चढ़कर लोग भाग लेते हैं। 

ऐसे हुई परंपरा की शुरुआत

Hindus also celebrate moharram in this village of azamgarh
ताजिया बनाने के लिए रखी गई सोने की झूमर और चांदी की कलशी - फोटो : amar ujala
गांव के बुजुर्गों ने बताया कि यह परंपरा काफी पुरानी है जिसका आज भी निर्वहन हो रहा है। वह लोग बताते हैं कि 250 वर्ष से पहले की बात है डोरवा चौहान बस्ती में एक परिवार रहता था। जिनका नाम टोकरी था।

टोकरी के तीन पुत्र हुए गुज्जन, बालगोविंद और धर्मू हुए। गुंजन और बालगोविंद की महामारी में मृत्यु हो गई। धर्मू की कोई संतान नहीं थी। तब उनके पिता टोकरी चिंतित रहने लगे कि हमारा वंश कैसे आगे बढ़ेगा।

संजोग से एक दिन एक फकीर उनके पास आए और उनकी चिंता का कारण पूछा। टोकरी के बताने पर फकीर ने उन्हें अंजान शहीद में मनाई जाने वाली ताजिया के बारे में बताते हुए कहा कि वहां जाकर प्रार्थना करें। तब ट़ोकरी अपने पुत्र धर्मू और बहू सत्यवती को मोहर्रम के दौरान अंजानहीद गए और वहां प्रार्थना की।

एक साल में ही उनकी मनोकामना पूर्ण हुई। धर्मू को चार पुत्र हुए। धीरे धीरे इनका वंश बढ़ता गया। आज 125  से अधिक घरों की चौहान बस्ती है। आज भी इस बस्ती के लोग इस परंपरा को निभा रहे हैं। आज भी यहां का ताजिया पूरे पूर्वांचल में मशहूर है। 
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