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#हिंदीहैंहम: विश्व पटल पर हिंदी भाषी लोग कई क्षेत्रों में लहरा रहे हैं अपना परचम

Wed, 26 Aug 2020 10:58 AM IST
गीतार्जुन गौतम न्यूज डेस्क, अमर उजाला, वाराणसी
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, वाराणसी Published by: गीतार्जुन गौतम Updated Wed, 26 Aug 2020 10:58 AM IST
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Hindi Hain Hum: Hindi speaking people in the world are fluttering in many areas
आकांक्षा जैतली। - फोटो : अमर उजाला

दुनिया की सबसे प्राचीन भाषा हिंदी है। आज विश्व का ऐसा कोई देश नहीं होगा, जहां हिंदी न बोली जाती हो। हिंदी भाषी लोग विश्व पटल पर कई क्षेत्रों में अपना परचम लहरा रहे हैं। हिंदी हमारे दिल की भाषा है। हिंदी ही एकमात्र भाषा है, जिसमें इंसान अपनी अभिव्यक्ति, अनुभूति पूर्णरूप से जाहिर कर सकता है। पूरे संसार में हिंदी फिल्में और हिंदी गाने सबसे ज्यादा पसंद किए जाते हैं। हिंदी के प्रचार-प्रसार में हिंदी फिल्मों का बहुत बड़ा योगदान है। हिंदी का ही प्रभाव है कि विदेशों से बहुत संख्या में लोग हिंदी पढ़ने भारत आ रहे हैं। 

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बेटी को हिंदी के प्रति कर रहीं जागरूक
गायघाट निवासी आकांक्षा जैतली लंदन में अकाउंटेंट हैं। विदेश में रहते हुए भी आकांक्षा लंदन में जन्मी अपनी बेटी अविश्वका को हिंदी लिखने और बोलने में मदद करती हैं। वो कहती हैं, आजकल हमलोग दिनचर्या में भी अंग्रेजी भाषा का प्रयोग कर रहे हैं, जो देशहित में नहीं है। हिंदी भाषा हमें स्नेह, ममता, प्रेम, करुणा और प्यार करना सिखाती है। आकांक्षा बेटी को हिंदी भाषा के प्रति जागरूक करने के साथ भारतीय संस्कार और संस्कृति से जोड़े रखने के लिए पर्व और त्योहारों के बारे में भी बताती हैं। अविश्वका अभी 11 साल की है और हिंदी काफी अच्छा बोलती है। हिंदी बोलने के साथ हिंदी लिखने का अभ्यास वह लंदन स्थित ब्रह्म ऋषि मिशन आश्रम में करती हैं। अविश्वका पिछले साल 16 फरवरी 2019 में भारतीय उच्चायोग लंदन में आयोजित बाल हिंदी कविता पाठ प्रतियोगिता में तीसरा स्थान प्राप्त कर चुकी हैं। उसके पिता विशाल जैतली लंदन स्थित टेस्को कैफे में जनरल मैनेजर हैं। काशी के गायघाट निवासी अपने नाना विनय भूषण कुल को अविश्वका अपनी प्रेरणा मानती हैं और नाना की तरह ही कार्टूनिस्ट बनना चाहती हैं।

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सतेंद्र सिंह - फोटो : अमर उजाला

हिंदुस्तान की प्राणवायु है हमारी हिंदी
हिंदी हमारे समाज को जोड़ने का काम करती है। आज भी समाज का एक बड़ा वर्ग हिंदी ही समझता और बोलता है। कहा जाए तो हिंदी हिंदुस्तान की प्राणवायु है। देश हो या विदेश हिंदी हमें अपनों से जोड़ने के लिए एक माध्यम है। विदेशों में भी हिंदी भाषा को बढ़ावा देने के  लिए लोग कार्य कर रहे हैं। आज देश में मनोरंजन का सर्वाधिक प्रचलित साधन भारतीय फिल्में हैं। देश के हर कोने में हिंदी फिल्में देखी जाती हैं। हम कह सकते हैं कि हिंदी फिल्मों ने हिंदी भाषा के प्रचार-प्रसार में काफी योगदान दिया है। कई देशों में भी हिंदी फिल्मों को देखने वाले बहुत सारे लोग हैं। - सतेंद्र सिंह, भोजपुरी अभिनेता

Hindi Hain Hum: Hindi speaking people in the world are fluttering in many areas
रत्नाकर दुबे - फोटो : अमर उजाला

हिंदी माध्यम से शिक्षा ने दिलाया मुकाम
उत्तर प्रदेश उच्चतर शिक्षा सेवा आयोग के अंतर्गत हिंदी विषय में असिस्टेंट प्रोफेसर पद पर चयनित रत्नाकर दुबे कहते हैं कि हिंदी में भविष्य की भरमार है। वह कहते हैं, मैंने अपनी प्राथमिक शिक्षा हिंदी माध्यम से ली। आज उसी हिंदी ने मुझे सफलता की सीढ़ियों तक पहुंचाया है। सरकारी नौकरियों में हिंदी की मांग कम नहीं हुई है। जरूरत हिंदी को और जरूरी बनाने की है। हिंदी हमारी मातृभाषा है। हम इसमें सहज महसूस करते हैं और मनोभाव व्यक्त करते हैं। बापू ने कहा था, अपनी भाषा से दूर होकर कोई भी तरक्की स्थायी नहीं हो सकती। उनकी 150वीं जयंती के वर्ष में 'अमर उजाला' की यह विशेष मुहिम निसंदेह सराहनीय है।

हमारी पीढ़ियों ने आजादी के बाद एक विदेशी भाषा पर आश्रित होकर उसे सीखने में जितनी ऊर्जा खर्च की है, उसे हम मौलिक भाषा के विकास में लगाते तो आज सूरत कुछ और होती। वैज्ञानिक रूप से खरी हिंदी भाषा का साहित्य बेहद समृद्ध है। मुझे गर्व है की मेरी अभिव्यक्ति और रोजगार की भाषा हिंदी है।

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हिंदी हैं हम अभिनव अरुण। - फोटो : अमर उजाला

भाषा के आकर्षण ने मुझे बांधा
भाषा के आकर्षण ने मुझे ऐसा बांधा कि नब्बे के दशक में अनायास ही मेरे कदम पत्रकारिता की ओर मुड़े और अनेक अखबारों में नौकरी और फीचर लेखन के साथ प्रसारण क्षेत्र में आ गया। इस भाषा ने मेरी पहचान बनाई और मुझमें अकूत आत्मविश्वास भरा। लेख, कहानियां, कविताएं और गजलें लिखते हुए मैंने इस भाषा से अपना असीम लगाव महसूस किया। मेरा प्रयास होता है कि अधिकाधिक लोगों के मन में हिंदी साहित्य और भाषा के प्रति लगाव को बढ़ाया जाय। इसी उद्देश्य से पुस्तकों, पत्र-पत्रिकाओं  के साथ साथ कवि सम्मेलनों और सोशल साइट्स पर भी मेरी सक्रियता है। यदि हम रेडियो, टेलीविजन और मीडिया के अन्य लोकप्रिय माध्यमों में भाषा के प्रति सतर्कता बरतें और इसे सरल बोधगम्य बनाए रखते हुए विकृतियों से परहेज करें तो नि:संदेह यह हिंदी की गरिमा वृद्धि में हमारा अमूल्य योगदान होगा। - अभिनव अरुण, आकाशवाणी वाराणसी के वरिष्ठ उद्घोषक और उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान से सम्मानित साहित्यकार

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