हस्तशिल्प: सात समंदर पार फिर बिछेगा पूर्वांचल का हुनर, करोड़ों के ऑर्डर से गुलजार होगा बाजार; जानें खास
Varanasi News: बीते कुछ महीनों में अमेरिकी पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के कार्यकाल के दौरान लगाए गए टैरिफ का सीधा असर भारतीय हस्तशिल्प उद्योग पर पड़ा। खासकर कालीन कारोबार को इससे बड़ा झटका लगा और व्यापार में करीब 65 प्रतिशत तक गिरावट दर्ज की गई।
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पूर्वांचल का पारंपरिक कालीन उद्योग अंतरराष्ट्रीय बाजार में अपनी मजबूत मौजूदगी दर्ज कराने की उम्मीद लगाए बैठा है। जनवरी के अंत में जर्मनी और अमेरिका में आयोजित होने वाले अंतरराष्ट्रीय ट्रेड फेयर को लेकर पूर्वांचल के कालीन कारोबारियों में खासा उत्साह है। कारोबारियों का कहना है कि इन ट्रेड फेयर के जरिये करोड़ों रुपये के नए ऑर्डर मिलने की संभावना बन सकती है, जिससे पिछले कुछ महीनों में आई गिरावट से उबरने में मदद मिलेगी।
अमेरिकी टैरिफ नीति में सख्ती के बाद निर्यातकों ने रणनीति बदलनी शुरू कर दी है। अब यूरोपीय देशों में निर्यात बढ़ाने पर जोर दिया जा रहा है। जर्मनी में लगने वाला ट्रेड फेयर भी इसी रणनीति का अहम हिस्सा माना जा रहा है। कारोबारियों का कहना है कि यदि यूरोप से बड़े ऑर्डर मिलते हैं, तो अमेरिकी नुकसान की भरपाई काफी हद तक हो सकती है। फिलहाल पूर्वांचल का कालीन उद्योग लगभग 5,500 करोड़ रुपये के सालाना कारोबार पर टिका है।
इस उद्योग से लाखों बुनकर, शिल्पकार और छोटे व्यापारी जुड़े हुए हैं। अमेरिका जैसे बड़े बाजार में आई गिरावट का असर सीधे तौर पर इन लोगों की रोजी-रोटी पर पड़ा है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय ट्रेड फेयर से मिलने वाले संभावित ऑर्डर कारोबार को रफ्तार देने के साथ ही बुनकरों और शिल्पियों के चेहरे पर फिर से मुस्कान ला सकते हैं।
सता रही चिंता
कारोबारियों के मुताबिक, पहले हाथ से बने कालीनों पर अमेरिका में किसी प्रकार का टैरिफ नहीं लगाया जाता था, लेकिन अन्य भारतीय उत्पादों पर अलग-अलग श्रेणियों में 10 प्रतिशत तक शुल्क लगने से भारतीय सामान वहां महंगा हो गया। इसका असर यह हुआ कि अमेरिकी बाजार में मांग कमजोर पड़ी और पूर्वांचल के निर्यातकों को नुकसान उठाना पड़ा।
प्रसिद्ध कालीन निर्यातक और लघु उद्योग भारती के प्रदेश उपाध्यक्ष दीनानाथ बरनवाल का कहना है कि टैरिफ बढ़ने से सिर्फ भारत ही नहीं, बल्कि अमेरिका को भी नुकसान हो रहा है। भारतीय उत्पादों के महंगे होने से वहां के उपभोक्ताओं की जेब पर अतिरिक्त बोझ पड़ रहा है। उन्होंने बताया कि अमेरिका लंबे समय से भारत के कृषि, पशुपालन और डेयरी सेक्टर में अपनी पैठ बढ़ाने की कोशिश करता रहा है, लेकिन इसके साथ-साथ भारतीय हस्तशिल्प और हथकरघा उत्पादों का सबसे बड़ा बाजार भी अमेरिका ही है।
प्रति वर्ष 6-7 हजार करोड़ का होता है कारोबार
पूर्वांचल निर्यातक संघ के अध्यक्ष रघु मेहरा के मुताबिक, पूर्वांचल से हर साल करीब 6 से 7 हजार करोड़ रुपये के उत्पाद अमेरिका को निर्यात किए जाते हैं। इसमें कालीन, वॉल हैंगिंग, दरी, बनारसी साड़ी, सिल्क उत्पाद और हस्तनिर्मित खिलौने शामिल हैं। भदोही, मिर्जापुर, वाराणसी और आसपास के इलाकों में तैयार होने वाले कालीन दुनिया भर में अपनी गुणवत्ता और कारीगरी के लिए पहचाने जाते हैं। यही कारण है कि अमेरिकी बाजार में इनकी मांग लंबे समय तक बनी रही है।