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Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Varanasi News ›   Gyanvapi-Kashi Vishwanath mandir case: Lord Vishweshwar plea friend and his opponents presented arguments in court

ज्ञानवापी-काशी विश्वनाथ मंदिर मामला: भगवान विश्वेश्वर के वाद मित्र और उनके विपक्षियों ने अदालत में पेश की थी ये दलीलें

Fri, 09 Apr 2021 01:25 PM IST
गीतार्जुन गौतम न्यूज डेस्क, अमर उजाला, वाराणसी
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, वाराणसी Published by: गीतार्जुन गौतम Updated Fri, 09 Apr 2021 01:25 PM IST
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Gyanvapi-Kashi Vishwanath mandir case: Lord Vishweshwar plea friend and his opponents presented arguments in court
श्री काशी विश्वनाथ मंदिर। - फोटो : अमर उजाला।

ज्ञानवापी परिसर का रडार तकनीक से पुरातात्विक सर्वेक्षण कराने जाने के मामले में वाद मित्र विजय शंकर रस्तोगी की तरफ से वर्ष 1991 से लंबित मुकदमे में आवेदन देकर कहा गया कि मौजा शहर खास स्थित ज्ञानवापी परिसर के 9130, 9131, 9132 रकबा एक बीघा नौ बिस्वा जमीन का पुरातात्विक सर्वेक्षण करके यह बताया जाए कि जो जमीन है, वह मंदिर का अवशेष है या नहीं। साथ ही विवादित ढांचे का फर्श तोड़कर यह देखा जाए कि 100 फीट गहरा अरघा ज्योतिर्लिंग स्वयंभू विश्वश्वेरनाथ का परिलक्षित होता है या नहीं? दीवारें प्राचीन मंदिर की हैं या नहीं?

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14वीं शताब्दी के मंदिर में प्रथम तल में ढांचा और भूतल में तहखाना है, जिसमें 100 फीट गहरा शिवलिंग है, यह खुदाई से स्पष्ट हो जाएगा। मंदिर का जीर्णोद्धार पहले 2050 विक्रमी संवत में राजा विक्रमादित्य ने, फिर सतयुग में राजा हरिश्चंद्र ने और वर्ष 1780 में महारानी अहिल्याबाई होल्कर ने कराया था। यह भी कहा कि 100 वर्ष से ज्यादा समय तक 1669 से 1780 तक मंदिर का अस्तित्व ही नहीं रहा।
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विवादित ढांचा खोदे जाने से शांतिभंग की आशंका
वहीं, सेंट्रल सुन्नी वक्फ बोर्ड के अधिवक्ता अभय नाथ यादव का कहना था कि दावे के अनुसार, जब मंदिर तोड़ा गया, तब ज्योतिर्लिंग उसी स्थान पर मौजूद था, जहां आज है। उसी दौरान राजा अकबर के वित्तमंत्री टोडरमल की मदद से नरायन भट्ट ने मंदिर बनवाया था, जो उसी ज्योतिर्लिंग पर बना है। ऐसे में विवादित ढांचा के नीचे दूसरा शिवलिंग कैसे आया? इसे देखते हुए खुदाई नहीं होनी चाहिए। रामजन्म भूमि की तरह पुरातात्विक रिपोर्ट मंगाए जाने पर कहा कि स्थितियां विपरीत हैं।

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वहां साक्षियों के बयान के बाद विरोधाभास होने पर कोर्ट ने रिपोर्ट मंगाई थी, जबकि यहां के मामले में अभी तक किसी का साक्ष्य हुआ ही नहीं है। ऐसे में साक्ष्य आने के बाद विरोधाभास होने पर कोर्ट रिपोर्ट मंगा सकती है। दलील दी गई कि साक्ष्य एकत्र करने के लिए रिपोर्ट नही मंगाई जा सकती है। यह भी कहा गया कि विवादित ढांचा खोदे जाने से शांतिभंग भी हो सकती है, ऐसे में कोर्ट का दायित्व है कि वहां शांति बनी रहे। अदालत में अंजुमन इंतजामिया मसाजिद कमेटी की तरफ से रईस अहमद खान, अफताब अहमद, मुमताज अहमद और सेंट्रल सुन्नी वक्फ बोर्ड की तरफ से तौफीक खान ने भी दलीलें पेश की थीं।

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