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दिग्गज सुरों से निकली उस्ताद की याद
ब्यूरो/अमर उजाला वाराणसी
Updated Mon, 21 Mar 2016 02:05 AM IST
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उस्ताद को किया याद
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बांसुरी सम्राट पद्म विभूषण पं. हरिप्रसाद चौरसिया ने शहनाई के जादूगर भारत रत्न उस्ताद बिस्मिल्लाह खां को रविवार की रात प्रेम पर आधारित राग झिंझोटी से नमन किया। उड़ंत और मीड लगाने के उनके खास अंदाज पर तालियों की कभी बौछार हुई तो कभी हर हर महादेव के उद्घोष गूंजे। ठुमरी, दादरा अंग में पद्मभूषण पं. छन्नूलाल मिश्र ने गांव से लेकर शहर तक की होरी से फागुनी बयार बहाई। उस्ताद की सौंवी जन्मशती पर संगीत नाटक अकादमी की ओर से आयोजित चार दिवसीय संगीतोत्सव ‘सुर बनारस’ की दूसरी निशा दिग्गज कलाकारों की मौजूदगी में सुर-लय के ऐसे ही भावों के साथ जीवंत हुई।
नागरी नाटक मंडली के सभागार में शुरुआत हुई अब्दुल सलीम नौशाद के क्लेरोनेट से। इनके साथ तबले पर मुकेश रासगापा ने संगत की। साज पर साथ दिया अब्दुल सलीम नौशाद ने। इनके बाद पं. राजेंद्र प्रसन्ना ने बांसुरी पर राग रागेश्री की अवतारणा की। इनके साथ तबले पर पं. ललित कुमार थे। फिर बारी आई प्रमोद गायकवाड़ की। तबले पर नितिन गायकवाड़ ने और चौकड़ा पर केदार जाधव ने संगत की। इनके बाद ठुमरी के गुरु पं. छन्नूलाल मिश्र ने राग हंसध्वनि में अलापचारी शुरू की। तीन ताल में निबद्ध द्रुत ख्याल की बंदिश के बाद उन्होंने झप ताल में शास्त्रीय होली की बंदिश प्रस्तुत की। गांव से शहर तक की होली के प्रकारों को उन्होंने सुरों से सजाया।
दादरा-कहरवा ताल में अपनी मशहूर होरी की रचना- खेलें मशाने में होरी दिगंबर खेलें मशाने में होरी... की जब उन्होंने प्रस्तुति की तब मंडली का सभागार तालियों से गूंज उठा। इनके साथ तबले पर कृष्ण कुमार उपाध्याय ने संगत की। अंत में बारी आई पं. हरि प्रसाद चौरसिया की। उन्होंने राग झिंझोटी में छोटे अलाप के बाद रूपक ताल में 16 मात्रा की बंदिश बजाई। तबले पर पद्मश्री विजय घाटे और पखावज पर पं. भवानी शंकर ने संगत की। बंशी की तान से उन्होंने हर किसी को दीवाना बना दिया। संचालन साधना श्रीवास्तव ने किया।अंत में संगीत नाटक अकादमी की ओर से उनको अंग वस्त्रम से नवाजा गया।
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नागरी नाटक मंडली के सभागार में शुरुआत हुई अब्दुल सलीम नौशाद के क्लेरोनेट से। इनके साथ तबले पर मुकेश रासगापा ने संगत की। साज पर साथ दिया अब्दुल सलीम नौशाद ने। इनके बाद पं. राजेंद्र प्रसन्ना ने बांसुरी पर राग रागेश्री की अवतारणा की। इनके साथ तबले पर पं. ललित कुमार थे। फिर बारी आई प्रमोद गायकवाड़ की। तबले पर नितिन गायकवाड़ ने और चौकड़ा पर केदार जाधव ने संगत की। इनके बाद ठुमरी के गुरु पं. छन्नूलाल मिश्र ने राग हंसध्वनि में अलापचारी शुरू की। तीन ताल में निबद्ध द्रुत ख्याल की बंदिश के बाद उन्होंने झप ताल में शास्त्रीय होली की बंदिश प्रस्तुत की। गांव से शहर तक की होली के प्रकारों को उन्होंने सुरों से सजाया।
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दादरा-कहरवा ताल में अपनी मशहूर होरी की रचना- खेलें मशाने में होरी दिगंबर खेलें मशाने में होरी... की जब उन्होंने प्रस्तुति की तब मंडली का सभागार तालियों से गूंज उठा। इनके साथ तबले पर कृष्ण कुमार उपाध्याय ने संगत की। अंत में बारी आई पं. हरि प्रसाद चौरसिया की। उन्होंने राग झिंझोटी में छोटे अलाप के बाद रूपक ताल में 16 मात्रा की बंदिश बजाई। तबले पर पद्मश्री विजय घाटे और पखावज पर पं. भवानी शंकर ने संगत की। बंशी की तान से उन्होंने हर किसी को दीवाना बना दिया। संचालन साधना श्रीवास्तव ने किया।अंत में संगीत नाटक अकादमी की ओर से उनको अंग वस्त्रम से नवाजा गया।
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