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पहले गणतंत्र दिवस पर गांवों में बनी थी घुघरी और खीर
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गणतंत्र का अर्थ होता है हमारा संविधान, हमारी सरकार, हमारे कर्त्तव्य और हमारा अधिकार। हमारा संविधान हमें बोलने का और अपने विचार रखने का अधिकार देता है। 26 जनवरी को हम अपना 73वां गणतंत्र दिवस मनाएंगे। गणतंत्र का अर्थ होता है कि देश का मुखिया संविधान द्वारा निर्मित होगा और वह वंशानुगत न होकर लोगों द्वारा चुना जाएगा। इसी अनुसार भारत का राष्ट्रपति वंशानुगत न होकर चुना जाता है। आज हम बात करेंगे प्रथम गणतंत्र के साक्षी रहे बुजुर्गों से।
जश्न का तरीका आधुनिक हुआ
वाराणसी। चंदुआ छित्तूपुर के रहने वाले श्यामला सिंह (90) ने बताया कि पहले गणतंत्र और 73वें गणतंत्र दिवस में बहुत फर्क आया है। हम लोगों के समय में स्कूली बच्चों में बहुत उत्साह होता था। घर से हाथ से तिरंगा बनाकर स्कूल ले जाते थे। सुबह स्कूल से नजदीकी गांवों में भारत माता की जय, वंदे मातरम, गांधी, नेहरू, लाल बहादुर शास्त्री, शहीद भगत सिंह, सुभाष चंद्र बोस के नारे लगाते थे। उस समय के बुजुर्ग, जवान बच्चों में अलग अनुभूति हुआ करती थी। आज के युवा, अंग्रेजी स्कूल में पढ़ने वाले बच्चों में वह जज्बा गणतंत्र दिवस के प्रति नही देखा। हां जश्न मनाने का तरीका आधुनिक हो गया है। ब्यूरो
अंग्रेजों के घोड़े की टॉप से गांव में मच जाती थी दहशत
सारनाथ। सिंहपुर की 95 वर्षीय समृद्धि देवी कहती हैं कि पहले अंग्रेजों का जुल्म किसानों पर खूब होता था। कर लेने के लिए घोड़े पर चढ़कर अंग्रेज अफसर आते थे। जैसे ही घोड़ों की टॉप गांव में सुनाई देती थी लोग घरों में छिप जाते थे। कर न देने पर यातनाएं झेलनी पड़ती थीं। गुलामी का वह दौर आंखों के सामने से अभी भी ओझल नहीं होता है। अंधेरे के बाद उजाला जरूर होता है और वह दिन हमें गणतंत्र दिवस के रूप में मिला। गणतंत्र वाले दिन पूरे गांव में मटर घुघरी बनी थी और खाड़ का रस। गांव के बड़े बुजुर्ग से लेकर हम बच्चे भी गणतंत्र के इस महापर्व में शामिल थे। जिस तपस्या व कुर्बानी से गणतंत्र का उपहार मिला है उसका सम्मान करना चाहिए। आजादी के पहले का दिन बहुत ही भयानक था। संवाद
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पूरे मोहल्ले में एक जगह फहराया जाता था झंडा
पिंडरा। पिंडरा के 84 वर्षीय झन्ना जायसवाल बताते हैं कि गणतंत्र दिवस मनाने में समय के साथ काफी बदलाव हुआ। पहले गली मोहल्लों से युवाओं की टीम निकलती थी और उत्साह से लबेरेज झंडा लेकर पूरे गांव में घूमते थे। आज 73 वें गणतंत्र दिवस पर सब कुछ बदल गया है। पहले देश के शहीदों और आजादी के सपूतों के याद में आयोजन होते थे, लेकिन अब पार्टी की तरफ से मनाया जाने लगा है। पहले मिठाई की जगह गुड़ और लेमन चूस मिलते थे। पूरे मोहल्ले में एक जगह झंडा फहराया जाता था अब तो हर नुक्कड़ पर झंडा फहराया जाने लगा है। एक चीज सामान्य मिलती वह स्कूलों में है। प्राथमिक विद्यालयों में आज भी बच्चे प्रभात फेरी निकालते हैं और सांस्कृतिक व देशभक्ति कार्यक्रम की प्रस्तुति कर शहीदों को याद करते हैं। संवाद
हर घर में जले थे दीये
रोहनिया। आराजी लाइन विकासखंड के ग्राम शहावाबाद निवासी राधे श्याम जायसवाल (87) ने बताया कि पहले गणतंत्र दिवस पर गजब का उत्साह था। जगह-जगह लोग भारत माता की जय, वंदे मातरम के नारे लगा रहे थे। हम लोग उस समय बच्चे थे। हाथों में तिरंगा लेकर घरों से पूरे गांव में दौड़ लगा रहे थे। बड़े बुजुर्ग भी काफी खुश थे, लोग तरह-तरह की चर्चाएं कर रहे थे। मंदिरों में मिठाइयां चढ़ाकर बांटी गईं थीं और शाम को लोगों ने घरों पर दीपक भी जलाए थे। उस दिन हमारे घर पर पूड़ी खीर बनी थी। सभी लोग काफी उत्साहित थे। अब उस तरीके का उत्साह बच्चों और युवाओं में नहीं दिखाई पड़ता है। आज लोग ज्यादातर जातिगत आधार पर बातें करते हैं जो आने वाले समय के लिए काफी खतरनाक है। जातिगत भावनाएं युवाओं के मन में बैठा रहे हैं जो समाज व देश के लिए उचित नहीं है। युवाओं को देश व समाज के हित में कार्य करना चाहिए ताकि देश का मान बढ़े। संवाद
गांव में झंडा लेकर निकलते थे छात्र
दानगंज। नियार बाजार के हरी प्रसाद जायसवाल (85) ने बताया कि पहले गणतंत्र दिवस पर तैयारियां एक महीने पहले होती थीं। लोगों में उत्साह था। स्कूलों में सुबह सभी लोग जाते थे और झंडारोहण के बाद छात्र विद्यालय से निकलकर गांव की गली-गली तक पैदल ही झंडा हाथ में लेकर गणतंत्र दिवस के नारे लगाते हुए घूमते थे। विद्यालय में जब जुलूस पहुंचता था तो वहां पर छात्रों द्वारा गीत संगीत नाटक की प्रस्तुति होती थी। विद्यालय के तरफ से लड्डू बांटा जाता था और बच्चे काफी उत्साहित होकर घरों को लौटते थे। संवाद
बदलते भारत को अपनी आंखों से देख रहा हूं
राजातालाब। मोहनसराय के बेचन सिंह (102) पहले गणतंत्र को याद करते हुए पुरानी यादों में खो जाते हैं। वह कहते हैं कि देश की आजादी और पहली बार गणतंत्र दिवस मनाने का वाकया उन्हें आज भी अच्छी तरह याद है। अंग्रेजों से राष्ट्र मुक्ति के बाद उनके काले कानूनों को हटाने की छटपटाहट थी। अपनी सरकार ने जब पहली बार अपना संविधान लागू किया और गणतंत्र दिवस मनाया तो ऐसा लगा कि अब हम परिपूर्ण हो गए हैं। उस समय राष्ट्र के प्रति सोचकर हिंदुस्तान और अपने ऊपर गर्व महसूस होता था। उस समय ख्वाब थे कि कुछ ही दिनों बाद भारत की राष्ट्र शक्ति का जग में वर्चस्व होगा। आज भी अपनी आंखों से बदलते भारत को देख रहा हूं। युवाओं के आत्मनिर्भर भारत के संकल्प से मन खुश हो जाता है।
युवाओं को लेनी चाहिए शहीदों से प्रेरणा
पिंडरा। पिंडरा निवासी जवाहर लाल साहू (85) ने कहा कि गणतंत्र दिवस पर शहीदों को नमन करने के साथ ही अपना संविधान लागू होने की खुशी थी। युवा पीढ़ी को भारत के शहीदों से प्रेरणा लेनी चाहिए। युवाओं का कर्तव्य बनता है कि वह देश के विकास के लिए अपना पूरा योगदान दें। पहले गणतंत्र दिवस पर हर गांव की गली-गली तक जाते थे। तिरंगा लेकर मैं भी खुद जाया करता था। लोगों में उत्साह था, स्कूलों में सुबह सभी बच्चे पहुंचे थे और विद्यालय से निकलकर गांव की गली तक पैदल झंडा हाथ में लेकर गणतंत्र दिवस के नारे लगाते हुए जाते थे। जब विद्यालय में जुलूस पहुंचा तो वहां पर छात्रों ने गीत, संगीत और नाटक की प्रस्तुति दी थी। इसके बाद विद्यालय में लेमन जूस और जलेबी बांटी गई थी। संवाद
घर-घर बनता था पकवान, बांटते थे मिठाई
बड़ागांव। बड़ागांव विकासखंड के सगुनहा ग्राम निवासी रामबली मिश्रा (96) ने बताया कि पहले गणतंत्र दिवस पर लोगों में गजब का उत्साह था। क्षेत्र के सभी लोग वंदेमातरम और भारत माता की जय के नारे लगा रहे थे। घर-घर पकवान बना था और लोगों में मिठाई बांटी गई थी। उस समय सभी बच्चों के हाथ में घर का बना हुआ तिरंगा झंडा रहता था। सुबह से ही हम लोग हाथों में तिरंगा लेकर अपने घरों से गांव-गांव टहलते थे। वहीं बडे बुजुर्ग भी काफी खुश थे। मंदिरों में मिठाइयां चढ़ाकर बांटी जा रही थीं और घरों पर दीपक भी जलाए गए थे। अब उस तरीके का उत्साह बच्चों युवाओं में नहीं दिखाई पड़ता है। आज के लोगों से अपील है कि लोगों के अंदर राष्ट्र प्रेम होना चाहिए तभी देश सुरक्षित रहेगा। संवाद
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जश्न का तरीका आधुनिक हुआ
वाराणसी। चंदुआ छित्तूपुर के रहने वाले श्यामला सिंह (90) ने बताया कि पहले गणतंत्र और 73वें गणतंत्र दिवस में बहुत फर्क आया है। हम लोगों के समय में स्कूली बच्चों में बहुत उत्साह होता था। घर से हाथ से तिरंगा बनाकर स्कूल ले जाते थे। सुबह स्कूल से नजदीकी गांवों में भारत माता की जय, वंदे मातरम, गांधी, नेहरू, लाल बहादुर शास्त्री, शहीद भगत सिंह, सुभाष चंद्र बोस के नारे लगाते थे। उस समय के बुजुर्ग, जवान बच्चों में अलग अनुभूति हुआ करती थी। आज के युवा, अंग्रेजी स्कूल में पढ़ने वाले बच्चों में वह जज्बा गणतंत्र दिवस के प्रति नही देखा। हां जश्न मनाने का तरीका आधुनिक हो गया है। ब्यूरो
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अंग्रेजों के घोड़े की टॉप से गांव में मच जाती थी दहशत
सारनाथ। सिंहपुर की 95 वर्षीय समृद्धि देवी कहती हैं कि पहले अंग्रेजों का जुल्म किसानों पर खूब होता था। कर लेने के लिए घोड़े पर चढ़कर अंग्रेज अफसर आते थे। जैसे ही घोड़ों की टॉप गांव में सुनाई देती थी लोग घरों में छिप जाते थे। कर न देने पर यातनाएं झेलनी पड़ती थीं। गुलामी का वह दौर आंखों के सामने से अभी भी ओझल नहीं होता है। अंधेरे के बाद उजाला जरूर होता है और वह दिन हमें गणतंत्र दिवस के रूप में मिला। गणतंत्र वाले दिन पूरे गांव में मटर घुघरी बनी थी और खाड़ का रस। गांव के बड़े बुजुर्ग से लेकर हम बच्चे भी गणतंत्र के इस महापर्व में शामिल थे। जिस तपस्या व कुर्बानी से गणतंत्र का उपहार मिला है उसका सम्मान करना चाहिए। आजादी के पहले का दिन बहुत ही भयानक था। संवाद
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पूरे मोहल्ले में एक जगह फहराया जाता था झंडा
पिंडरा। पिंडरा के 84 वर्षीय झन्ना जायसवाल बताते हैं कि गणतंत्र दिवस मनाने में समय के साथ काफी बदलाव हुआ। पहले गली मोहल्लों से युवाओं की टीम निकलती थी और उत्साह से लबेरेज झंडा लेकर पूरे गांव में घूमते थे। आज 73 वें गणतंत्र दिवस पर सब कुछ बदल गया है। पहले देश के शहीदों और आजादी के सपूतों के याद में आयोजन होते थे, लेकिन अब पार्टी की तरफ से मनाया जाने लगा है। पहले मिठाई की जगह गुड़ और लेमन चूस मिलते थे। पूरे मोहल्ले में एक जगह झंडा फहराया जाता था अब तो हर नुक्कड़ पर झंडा फहराया जाने लगा है। एक चीज सामान्य मिलती वह स्कूलों में है। प्राथमिक विद्यालयों में आज भी बच्चे प्रभात फेरी निकालते हैं और सांस्कृतिक व देशभक्ति कार्यक्रम की प्रस्तुति कर शहीदों को याद करते हैं। संवाद
हर घर में जले थे दीये
रोहनिया। आराजी लाइन विकासखंड के ग्राम शहावाबाद निवासी राधे श्याम जायसवाल (87) ने बताया कि पहले गणतंत्र दिवस पर गजब का उत्साह था। जगह-जगह लोग भारत माता की जय, वंदे मातरम के नारे लगा रहे थे। हम लोग उस समय बच्चे थे। हाथों में तिरंगा लेकर घरों से पूरे गांव में दौड़ लगा रहे थे। बड़े बुजुर्ग भी काफी खुश थे, लोग तरह-तरह की चर्चाएं कर रहे थे। मंदिरों में मिठाइयां चढ़ाकर बांटी गईं थीं और शाम को लोगों ने घरों पर दीपक भी जलाए थे। उस दिन हमारे घर पर पूड़ी खीर बनी थी। सभी लोग काफी उत्साहित थे। अब उस तरीके का उत्साह बच्चों और युवाओं में नहीं दिखाई पड़ता है। आज लोग ज्यादातर जातिगत आधार पर बातें करते हैं जो आने वाले समय के लिए काफी खतरनाक है। जातिगत भावनाएं युवाओं के मन में बैठा रहे हैं जो समाज व देश के लिए उचित नहीं है। युवाओं को देश व समाज के हित में कार्य करना चाहिए ताकि देश का मान बढ़े। संवाद
गांव में झंडा लेकर निकलते थे छात्र
दानगंज। नियार बाजार के हरी प्रसाद जायसवाल (85) ने बताया कि पहले गणतंत्र दिवस पर तैयारियां एक महीने पहले होती थीं। लोगों में उत्साह था। स्कूलों में सुबह सभी लोग जाते थे और झंडारोहण के बाद छात्र विद्यालय से निकलकर गांव की गली-गली तक पैदल ही झंडा हाथ में लेकर गणतंत्र दिवस के नारे लगाते हुए घूमते थे। विद्यालय में जब जुलूस पहुंचता था तो वहां पर छात्रों द्वारा गीत संगीत नाटक की प्रस्तुति होती थी। विद्यालय के तरफ से लड्डू बांटा जाता था और बच्चे काफी उत्साहित होकर घरों को लौटते थे। संवाद
बदलते भारत को अपनी आंखों से देख रहा हूं
राजातालाब। मोहनसराय के बेचन सिंह (102) पहले गणतंत्र को याद करते हुए पुरानी यादों में खो जाते हैं। वह कहते हैं कि देश की आजादी और पहली बार गणतंत्र दिवस मनाने का वाकया उन्हें आज भी अच्छी तरह याद है। अंग्रेजों से राष्ट्र मुक्ति के बाद उनके काले कानूनों को हटाने की छटपटाहट थी। अपनी सरकार ने जब पहली बार अपना संविधान लागू किया और गणतंत्र दिवस मनाया तो ऐसा लगा कि अब हम परिपूर्ण हो गए हैं। उस समय राष्ट्र के प्रति सोचकर हिंदुस्तान और अपने ऊपर गर्व महसूस होता था। उस समय ख्वाब थे कि कुछ ही दिनों बाद भारत की राष्ट्र शक्ति का जग में वर्चस्व होगा। आज भी अपनी आंखों से बदलते भारत को देख रहा हूं। युवाओं के आत्मनिर्भर भारत के संकल्प से मन खुश हो जाता है।
युवाओं को लेनी चाहिए शहीदों से प्रेरणा
पिंडरा। पिंडरा निवासी जवाहर लाल साहू (85) ने कहा कि गणतंत्र दिवस पर शहीदों को नमन करने के साथ ही अपना संविधान लागू होने की खुशी थी। युवा पीढ़ी को भारत के शहीदों से प्रेरणा लेनी चाहिए। युवाओं का कर्तव्य बनता है कि वह देश के विकास के लिए अपना पूरा योगदान दें। पहले गणतंत्र दिवस पर हर गांव की गली-गली तक जाते थे। तिरंगा लेकर मैं भी खुद जाया करता था। लोगों में उत्साह था, स्कूलों में सुबह सभी बच्चे पहुंचे थे और विद्यालय से निकलकर गांव की गली तक पैदल झंडा हाथ में लेकर गणतंत्र दिवस के नारे लगाते हुए जाते थे। जब विद्यालय में जुलूस पहुंचा तो वहां पर छात्रों ने गीत, संगीत और नाटक की प्रस्तुति दी थी। इसके बाद विद्यालय में लेमन जूस और जलेबी बांटी गई थी। संवाद
घर-घर बनता था पकवान, बांटते थे मिठाई
बड़ागांव। बड़ागांव विकासखंड के सगुनहा ग्राम निवासी रामबली मिश्रा (96) ने बताया कि पहले गणतंत्र दिवस पर लोगों में गजब का उत्साह था। क्षेत्र के सभी लोग वंदेमातरम और भारत माता की जय के नारे लगा रहे थे। घर-घर पकवान बना था और लोगों में मिठाई बांटी गई थी। उस समय सभी बच्चों के हाथ में घर का बना हुआ तिरंगा झंडा रहता था। सुबह से ही हम लोग हाथों में तिरंगा लेकर अपने घरों से गांव-गांव टहलते थे। वहीं बडे बुजुर्ग भी काफी खुश थे। मंदिरों में मिठाइयां चढ़ाकर बांटी जा रही थीं और घरों पर दीपक भी जलाए गए थे। अब उस तरीके का उत्साह बच्चों युवाओं में नहीं दिखाई पड़ता है। आज के लोगों से अपील है कि लोगों के अंदर राष्ट्र प्रेम होना चाहिए तभी देश सुरक्षित रहेगा। संवाद