कारगिल विजय दिवसः छुट्टी लेकर घर आने वाले थे गाजीपुर के कमलेश, घर पहुंची थी शहीद होने की खबर
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उनकी शहादत पर पिता अजनाथ सिंह और मां केशरी देवी के साथ ही जिले के लोगों की आंखों से फक्र के आसू बहे थे। 1965 में कारगिल और उरी सेक्टर में अपनी बहादुरी का परिचय दे चुके पिता का बेटे की शहादत पर सीना चौड़ा हो गया था, लेकिन सरकार की तरफ से सहायता मिलने के बाद शहीद की पत्नी के परिवार से अगल होने के बाद शहीद के माता-पिता दुखी है।
शहीद कमलेश सिंह ने पिता ने बताया कि बेटे की शहादत के बाद सरकार की तरफ से पत्नी के नाम पेट्रोल पम्प और सहायता के रूप में बड़ी राशि उपलब्ध कराई गई थी, लेकिन सहायता मिलने के बाद कुछ माह बाद कमलेश की पत्नी रंजना अपने मायके रहने लगी। परिवार से कोई वास्ता नहीं रख रही है।
उन्होंने कहा कि देश की सेवा में शहीद होने वाले जवानों की पत्नियों को सरकार सहायता उपलब्ध कराती है, लेकिन वह यह नहीं सोचती है कि शहीद के बूढ़े मां-बाप कैसे अपना जीवन-जावन करेंगे।
मेरी जानकारी मैं सिर्फ अकेला शहीद का वह पिता नहीं हूं, जिसकी बहू पति की शहादत के बाद सरकार से मिलने वाली सहायता के बाद परिवार से अलग हो गई हो। मेरा छोटा बेटा राकेश पढ़ा-लिखा है और उसे नौकरी की तलाश है।
शहीद कमलेश सिंह का जन्म 15 मई 1967 को हुआ था। कमलेश की तैनाती 457 एफआरआई भटिंडा में लांस नायक पद पर हुई थी। ऑपरेशन विजय में उनके अदम्य साहस के फलस्वरूप उन्हें सेना मेडल नवाजा गया था।