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काशी के घाट किनारे टहलने वालों की जलने लगी आखें, गंगा पर छाया डीजल इंजन का धुआं

Mon, 24 Feb 2020 04:48 PM IST
गीतार्जुन गौतम आलोक कुमार त्रिपाठी, अमर उजाला, वाराणसी
आलोक कुमार त्रिपाठी, अमर उजाला, वाराणसी Published by: गीतार्जुन गौतम Updated Mon, 24 Feb 2020 04:48 PM IST
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Ganga ghat near pollution diesel smoke in varanasi
काशी के घाट किनारे टहलने वालों की जलने लगी आखें, गंगा के ऊपर पर छाया जहरीला धुआं - फोटो : अमर उजाला।

वाराणसी शहर के बाद अब गंगा किनारे की हवा जहरीली होती जा रही है। मनोरंजन के नाम पर होने वाली लापरवाही अब भारी पड़ने लगी है। घाट किनारे हवाखोरी से लेकर व्यायाम करने वालों की सांसें भी फूलने लगी हैं। रविवार को तो बीच गंगा का नजारा हर किसी के लिए खतरे की घंटी था। डीजल इंजन से गंगा में चलाई जाने वाली बोट, बजड़ों से निकलने वाले काले धुएं की जद में घाट और गंगा रहीं। काला धुआं इस जहरीलेपन को और बढ़ाता जा रहा है।

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रविवार को पर्यटन विभाग की ओर से गंगा में बोट फेस्टिवल का आयोजन किया गया था। इस दौरान बजड़ों पर ही सांस्कृतिक और कला प्रदर्शनी का आयोजन किया गया था। इसके अलावा छुट्टी का दिन होने के कारण भी गंगा में तफरीह करने वालों की संख्या में सबसे अधिक रही।
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इसके चलते गंगा में डीजल इंजन से चलने वाली नावों की संख्या आम दिनों के मुकाबले ज्यादा हो गई। इसके कारण अस्सी से राजघाट के बीच काले धुएं की एक परत सी छा गई। मौसम खराब होने और धुंध के कारण तो काले धुएं का असर साफ देखने को मिला। घाट किनारे टहलने वालों ने तो आंखों में जलन की शिकायत भी की।

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नदी विज्ञानी प्रो. बीडी त्रिपाठी का कहना है कि घाट के किनारे बढ़ते पर्यटन से वायु, ध्वनि और जल प्रदूषण में जाने-अनजाने में बढ़ावा मिल रहा है। घाट कि घाट किनारे हवा में जहर घुलने का एक प्रमुख कारण डीजल इंजन से चलने वाली नौकाएं हैं। इसके चलते जलीय जीवों पर भी संकट के बादल मंडरा रहे हैं। 

घाट किनारे योग करना भी घातक
आयुर्वेद महाविद्यालय के असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. अजय कुमार का कहना है कि योग करने के दौरान हमारा शरीर वायु की अधिकतम मात्रा ग्रहण करता है। ऐसे में ऑक्सीजन के साथ प्रदूषण के घातक कण फेफ ड़े तक पहुंच जाते हैं। इस लिहाज से घाट किनारे सुबह-सुबह योग करना भी रोग का कारण बन सकता है। खतरनाक कण हमारे रक्त में घुलकर घातक बीमारियों को जन्म देते हैं।

ई-बोट की कोशिश रही नाकाम
गंगा में जल और किनारे पर वायु प्रदूषण नियंत्रित करने के लिए ई बोट की योजना बनी थी। चार अप्रैल 2017 को तत्कालीन मंत्री गिरिराज सिंह ने प्रतीक स्वरूप कुछ नाविकों को ई-बोट बांटी भी थी, लेकिन ई-बोट अपेक्षा के अनुरूप गंगा की स्थानीय परिस्थिति में फि ट नहीं बैठी। बेहद हल्की होने से इसे खतरनाक भी माना गया।

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