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Varanasi: 101वें संकट मोचन संगीत समारोह की अंतिम निशा, महाकुंभ की पूर्णाहुति में गूंज उठा स्वरमंत्रों का जाप

Sat, 04 May 2024 10:24 PM IST
अमन विश्वकर्मा अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी
अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी Published by: अमन विश्वकर्मा Updated Sat, 04 May 2024 10:24 PM IST
सार

Varanasi News: संकट मोचन संगीत समारोह की अंतिम निशा में देर रात तक सुर, लय और ताल का ऐसा संगम बना कि हर कोई मुरीद हो गया।

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Final touch of Sankat Mochan Sangeet Samaroh in varanasi
कविता कृष्णमूर्ति, एल. सुब्रह्मण्यम, विदुषी कंकना बनर्जी, हरीश तिवारी और पूर्वायन चटर्जी। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

प्रख्यात गायिका कविता कृष्णमूर्ति ने हनुमत दरबार में कभी प्रभु श्रीराम की महिमा तो कभी महाभारत और मीरा के भजनों से महाबली का वंदन किया। हर संगीत रसिक के चेहरे पर एक तृप्ति की झलक साफ देखने को मिल रही थी।

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निशा की चौथी प्रस्तुत पार्श्वगायिका कविता कृष्णमूर्ति की रही। उन्होंने कहा कि यह मंच शास्त्रीय संगीत का है। मगर मुझे भी प्रभु की कृपा से हाजिरी लगाने का मौका मिला, यह मेरा सौभाग्य है। उन्होंने हम कथा सुनाते राम सकल गुणधाम की ये रामायण है पुण्य कथ श्रीराम की... सुनाया तो सुधिजन प्रभु भक्ति में मगन हो गए। 
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इसके बाद सूरदास की रचना, जागिए ब्रजराज कुंवर कमल कुसुम फूले... और मीरा के भजन-जो तुम तोड़ो पिया मैं नाही तोड़ूं रे, तोरी प्रीत तोड़ी कृष्ण... आदि सुनाकर आनंदित किया। लोगों की फरमाइश पर उन्होंने सांसों की माला में सिमरूं मैं... और ढाई श्याम रोक लई... भी सुनाया।
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पांचवीं प्रस्तुति में वायलिन वादक डॉ. एल. सुब्रह्मण्यम की रही। उनके वादन को हर किसी ने जी भरकर के जीया। उन्होंने राग हंसध्वनि की रचना से वादन की शुरुआत की। इसके बाद रागों में विभिन्न ताल और आरोह-अवरोह का सुंदर वादन किया। उनके साथ पं. येल्ला वेंकटेश्वर ने मृदंगम और पं. तन्मय बोस ने तबले पर संगत की। 

निशा की छठवीं प्रस्तुति विदुषी कंकना बनर्जी की रही। उन्होंने राग अहीर भैरव की अवतारणा की। आपने झुमरा व तीन ताल में बंदिश को स्वर दिया। रामधुन से गायन को विराम दिया। गायन में किराना घराने की छाप सुनने को मिली। तबले पर सुभाष कांति दास, संवादिनी पर मोहित साहनी व सारंगी पर गौरी बनर्जी ने संगत की।

सातवीं प्रस्तुति में प्रख्यात सितार वादक पं. पूर्वायन चटर्जी ने जब मंच संभाला तो भास्करदेव अपनी लालिमा बिखेर चुके थे। उन्होंने सितार के तारों को झंकृत करते हुए राग मियां की तोड़ी की अवतारणा की। फिर राग चारुकेशी में गत बजाकर वादन को विराम दिया। बनारस घराने के तबला वादक पं. संजू सहाय ने संगत की। 


अंतिम प्रस्तुति में पं. भीमसेन जोशी के सुयोग्य शिष्य पं. हरीश तिवारी ने राग ललित में ख्याल गायकी के बाद अन्य रागों में कई बंदिशें सुनाईं। भजन से गायन को विराम दिया। तबले पर पं. विनोद लेले व संवादिनी पर पं. धर्मनाथ मिश्र ने संगत की। संचालन व्योमेश शुक्ला, साधना श्रीवास्तव, चंद्रिमा राय और जगदीश्वरी ने किया।

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