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Mother's Day:  मां न होकर भी ममता की मूरत, ऐसे पिता जिनका वात्सल्य अभिभूत करने वाला  

Sun, 13 May 2018 04:05 PM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, वाराणसी
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, वाराणसी Updated Sun, 13 May 2018 04:05 PM IST
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Father play role of mother in children life
Mothers day
मदर्स डे पर इस बार उस मां की बात, जो जननी नहीं है, पर ममता की मूरत है। जहां रिश्ते का नाम कुछ और है, भूमिका काफी अलग। जिंदगी ने जब मुश्किल लहरों के सामने उनके बच्चों को झोंका तो उन्होंने खुद को बदला, रिश्तों की सूरत बदल दी। बन गए मां...। मदर्स डे पर इस बार उन पिता की बात, जिनका ममत्व और वात्सल्य अभिभूत करने वाला है। कठिन घड़ी में उन्होंने न सिर्फ पिता की भूमिका निभाई, मां का लाड़ दुलार आत्मसात किया। पिता की तरह धीर गंभीर और सख्त भी हुए तो, बच्चों की जिद पर पिघले भी लेकिन मां की कमी कभी खलने नहीं दी।  
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मां की ममता, दुलार बिखेर रहे पिता 

Father play role of mother in children life
राधा शंकर उपाध्याय - फोटो : अमर उजाला
सोनारपुरा के राधा शंकर उपाध्याय ने भी अपने तीनों बच्चों प्रेरणा, चित्रा और कौशल की परवरिश में कोई कमी नहीं छोड़ी। बीते बुधवार को ही प्रेरणा राज्यपाल से सम्मानित हुई है। इन बच्चों की मां साथ नहीं रहतीं। करीब 12 साल हो गए। इन्होंने अपने पिता को ही मां और पिता दोनों रूपों में देखा है। एक पिता के लिए बाहर के काम के साथ घर में तीन छोटे-छोटे बच्चों की परवरिश करना आसान नहीं होता। उस पर बेटियां हो तो मुश्किल कही नहीं जा सकती।

प्रेरणा के पापा बताते हैं कि शुरुआत में बहुत दिक्कत हुई लेकिन अब तो जिंदगी रौ में आ गई है। बहुत कुछ है जो बेटियां मुझसे शेयर नहीं कर पातीं। उसके लिए मकान मालिक की पत्नी को बोल रखा है कि उनसे पूछ लिया करें। एक बार तो इन्हें छोड़कर मुंबई जाना पड़ा था। मकान मालिक के सहारे इन्हें छोड़ गया था। वो चार दिन मेरे और इन बच्चों के कैसे गुजरे थे, ये मैं ही जानता हूं। 

 
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पूरी कर रहे जीवनसाथी की अधूरी जिम्मेदारी 

Father play role of mother in children life
प्रोफेसर एस प्रणाम सिंह - फोटो : अमर उजाला
बीएचयू के प्रोफेसर एस प्रणाम सिंह दो बेटियों के पिता है। बड़ी बेटी एंजेला जब क्लास टू में थी तभी उनकी मां हमेशा के लिए दुनिया से चली गईं। उन पर दो बेटियों के देखभाल की जिम्मेदारी आ गई, इसे उन्होंने बखूबी निभाया। उन्हें बेहतर शिक्षा दी और आज उन्होंने एक अलग मुकाम हासिल कर लिया है। बड़ी बेटी एंजेला फैशन डिजाइनर है तो छोटी बेटी अनुश्री दुबई में ग्राफिक्स डिजाइनर है। लेकिन, बेटियों को सफलता के इस मुकाम तक ले जाना उतना आसान नहीं था।

एंजेला बताती हैं कि अपने दोस्तों की मां को उन्हें दुलारते, उनका ध्यान रखते देखती थी लेकिन वही भूमिका अदा करते हुए मैंने अपने पापा को देखा। पापा ने हमारी हर छोटी-छोटी जरूरतों का ध्यान रखा। चाहे होम वर्क कराना हो, चाहे बाहर घुमाने ले जाना हो। एग्जाम में हमारे साथ-साथ पापा भी रात भर जागते थे। कभी ऐसा लगा ही नहीं कि मां नहीं हैं। पापा ने कभी मां की कमी होने ही नहीं दी। डांट, प्यार, दुलार सब मां जैसा ही। 
 
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और बच्चों के लिए छोड़ दी डॉक्टर की प्रैक्टिस 

Father play role of mother in children life
डॉ. विकास नारायण तिवारी - फोटो : अमर उजाला
डॉ. विकास नारायण तिवारी का एक हंसता-खेलता परिवार था। करीब 11 साल पहले उनकी पत्नी गुजर गईं। छोटे-छोटे तीन बच्चे शुभम, शिवम और शिवांगी। एक पल को तो उन्हें समझ ही नहीं आया कि करना क्या है। इस मुश्किल घड़ी में उन्होंने अपने दिल को कड़ा किया और बच्चों के लिए मां की मूरत बन गए। बच्चों की परवरिश किसी और के हाथों में देने की बजाय, उन्होंने खुद ये जिम्मेदारी उठाई।

चूंकि बच्चे छोटे थे इसलिए उन्होंने अपना कॅरियर ही दांव पर लगा दिया। आखिर बच्चों से बढ़कर तो कॅरियर नहीं था। अपनी डॉक्टरी की प्रैक्टिस भी छोड़ दी और रम गए अपने बच्चों में। कहते हैं मां का लगाव बेटों से और पिता का लगाव बेटियों से ज्यादा होता है लेकिन शुभम और शिवम को ये कमी कभी अखरी ही नहीं। तीनों ही बच्चे पिता के बहुत ही करीब हैं जैसे बच्चे मां के करीब होते हैं। 

 

पिता को ही मान लिया मां 

Father play role of mother in children life
प्रमोद कुमार मिश्रा - फोटो : अमर उजाला
प्रमोद कुमार मिश्रा ने कभी सपने में भी नहीं सोचा होगा कि उनको अपने बच्चों कि परवरिश अकेले करनी होगी। लेकिन हादसों से पार पाकर जो आगे बढ़ जाए, उनके ही रिश्तों में सच्ची तासीर होती है। पत्नी के गुजरने के बाद उन्होंने नन्हीं अन्वेषा और अथर्व की देखभाल की। अन्वेषा इस साल पांचवीं में और अथर्व तीसरी कक्षा में गए हैं। दोनों ही मां के ज्यादा करीब थे।

अभी मुश्किल से साल भर हुआ है मां के गुजरे। बच्चों ने अब अपने पिता को ही मां मान लिया है और प्रमोद जी ने भी अब मां की पूरी भूमिका निभानी शुरू कर दी है। शुरुआत में बहुत ज्यादा दिक्कत हुई। जब बच्चे मां को ढूंढते थे तो उन्हें संभालना मुश्किल हो जाता था लेकिन अब वो मेरे साथ खुश हैं। अब छोटे भाई की फैमिली भी आ गई है तो कुछ सहारा हो गया है।
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