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नेता जी सुभाषचंद्र बोस के करीबी रहे कैप्टन निजामुद्दीन का निधन
टीम डिजिटल,वाराणसी
Updated Mon, 06 Feb 2017 05:47 PM IST
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निशानेबाजी से खुश होकर हिटलर ने भेंट की थी बंदूक
- फोटो : अमर उजाला
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आजाद हिंद फौज में नेताजी सुभाषचंद्र बोस के चालक रहे कैप्टन निजामुद्दीन उर्फ सैफुद्दीन का 117 वर्ष की अवस्था में सोमवार को तड़के चार बजे निधन हो गया। उन्होंने आजमगढ़ जिले के मुबारकपुर क्षेत्र के ढकवां स्थित अपने पैतृक आवास पर अंमित सांस ली।
उनके निधन की सूचना मिलते ही पूरे जिले और उन्हें जानने वालों में में शोक छा गया। जानकारी होते ही प्रशासनिक अमला उनके आवास पर पहुंच गया और श्रद्धांजलि अर्पित की गई।
उनके जनाजे में जिले के प्रतिष्ठित लोगों के साथ क्षेत्र के लोगों की भीड़ उमड़ी थी। दोपहर दो बजे गांव के कब्रिस्तान में उन्हें सुपुर्दे खाक कर दिया गया। नमाजे जनाजा मौलाना अबुल वफा ने पढ़ाई।
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निजामुद्दीन सन् 1947 ई0 में वर्मा में छितांग नदी के किनारे पर नेता जी के साथ आखिरी बार रहे और नेता जी के कहने पर वह भूमिगत हो गए। उसके बाद वे छुप छुप कर रहने लगे और किसी प्रकार वे अज्ञातवास का जीवन गुजारते रहे।
सन् 1969 ई0 में अपने गांव ढ़कवा आए। गांव रहकर भी वह अपनी पहचान छिपाए हुए थे।
उनके बारे में सिर्फ परिवार के लोग ही जानते थे। अमर उजाला अखबार ने ही कैप्टन निजामुद्दीन को नेता जी सुभाष चन्द्र बोस के अंगरक्षक एवं चालक के रूप में ढ़ूंढ निकाला। इसके बाद कैप्टन निजामुद्दीन चर्चा में आए।
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उनके निधन की सूचना मिलते ही पूरे जिले और उन्हें जानने वालों में में शोक छा गया। जानकारी होते ही प्रशासनिक अमला उनके आवास पर पहुंच गया और श्रद्धांजलि अर्पित की गई।
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उनके जनाजे में जिले के प्रतिष्ठित लोगों के साथ क्षेत्र के लोगों की भीड़ उमड़ी थी। दोपहर दो बजे गांव के कब्रिस्तान में उन्हें सुपुर्दे खाक कर दिया गया। नमाजे जनाजा मौलाना अबुल वफा ने पढ़ाई।
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निजामुद्दीन सन् 1947 ई0 में वर्मा में छितांग नदी के किनारे पर नेता जी के साथ आखिरी बार रहे और नेता जी के कहने पर वह भूमिगत हो गए। उसके बाद वे छुप छुप कर रहने लगे और किसी प्रकार वे अज्ञातवास का जीवन गुजारते रहे।
सन् 1969 ई0 में अपने गांव ढ़कवा आए। गांव रहकर भी वह अपनी पहचान छिपाए हुए थे।
उनके बारे में सिर्फ परिवार के लोग ही जानते थे। अमर उजाला अखबार ने ही कैप्टन निजामुद्दीन को नेता जी सुभाष चन्द्र बोस के अंगरक्षक एवं चालक के रूप में ढ़ूंढ निकाला। इसके बाद कैप्टन निजामुद्दीन चर्चा में आए।
बिना किसी को बताए हो गए ब्रिटिश आर्मी में भर्ती
बिना किसी को बताए हो गए ब्रिटिश आर्मी में भर्ती
- फोटो : demo photo
कैप्टन निजामुद्दीन का जन्म मुबारकपुर के ढ़कवा गांव में पहली जनवरी सन् 1900 ई. में हुआ था। उन्होंने प्राथमिक शिक्षा मामूली घर पर ही प्राप्त की और दीनी तालीम पायी। बचपन गांव में ही गुजरा। 22-23 साल की अवस्था में घर से बिना बताए सिंगापुर चले गए।
उनके पिता इमाम अली सिंगापुर में कैंटीन चलाते थे। सिंगापुर पहुंच कर वह पिता का हाथ बंटाने लगे। कुछ वर्षों के बाद वह बिना किसी को कुछ बताए चले गए और ब्रिटिश आर्मी में भर्ती हो गए। उस समय ब्रिटिश आर्मी और जापान के बीच युद्ध चल रहा था।
ब्रिटिश आर्मी चीफ ने फौज को निर्देश दिया कि भारतीय मर जाएं लेकिन ब्रिटिश खच्चर भी नहीं मरना चाहिए। यह सुनकर निजामुद्दीन बगावत कर सीधे नेता जी सुभाषचंद्र बोस के पास पहुंचे और अपनी व्यथा सुनाई। नेता जी ने उनको आजाद हिंद फौज में भर्ती कर लिया।
वह नेताजी के चालक के अलावा अंगरक्षक भी थे।
कर्नल निजामुद्दीन ने नेता जी के साथ एक लम्बा समय गुजारा और अपनी जांबाजी, ईमानदारी और बहादुरी की बदौलत कई रहस्यों को उजागर कर आजाद हिंद फौज में बहुत बड़ा योगदान दिया था।
उनके पिता इमाम अली सिंगापुर में कैंटीन चलाते थे। सिंगापुर पहुंच कर वह पिता का हाथ बंटाने लगे। कुछ वर्षों के बाद वह बिना किसी को कुछ बताए चले गए और ब्रिटिश आर्मी में भर्ती हो गए। उस समय ब्रिटिश आर्मी और जापान के बीच युद्ध चल रहा था।
ब्रिटिश आर्मी चीफ ने फौज को निर्देश दिया कि भारतीय मर जाएं लेकिन ब्रिटिश खच्चर भी नहीं मरना चाहिए। यह सुनकर निजामुद्दीन बगावत कर सीधे नेता जी सुभाषचंद्र बोस के पास पहुंचे और अपनी व्यथा सुनाई। नेता जी ने उनको आजाद हिंद फौज में भर्ती कर लिया।
वह नेताजी के चालक के अलावा अंगरक्षक भी थे।
कर्नल निजामुद्दीन ने नेता जी के साथ एक लम्बा समय गुजारा और अपनी जांबाजी, ईमानदारी और बहादुरी की बदौलत कई रहस्यों को उजागर कर आजाद हिंद फौज में बहुत बड़ा योगदान दिया था।