वाराणसी: छेदक कीट को रोक पाने में इरी का खाद फेल
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वाराणसी के अंतरराष्ट्रीय चावल अनुसंधान संस्थान (इरी) का तरल जैविक खाद संवर्धक पहले ही प्रयोग में फेल होता नजर आ रहा है। सब्जी की पैदावार में तो प्रयोग ठीक था मगर रोग और कीट प्रतिरोधक क्षमता कमजोर होने से किसानों ने इस्तेमाल करने से नकार दिया। गेहूं के लिए भी केवल 10 प्रतिशत ही फायदेमंद रहा। पिछले साल इरी के सहयोग से अमेरिकी कंपनी द्वारा विकसित किए गए तरल जैविक खाद संवर्धक का उपयोग पहली बार कुछ चयनित किसानों ने सब्जी, फूल और गेहूं पर किया। जिसका परिणाम कुछ मायने तक तो ठीक था मगर कीट और रोग प्रतिरोधक क्षमता में न होने से किसानों की उम्मीदों पर खरा नहीं उतरा।
काशी विद्यापीठ के ककरहिया गांव के किसान अजय ने बताया कि पहले प्रायोगिक तौर पर मैंने दो बीघा में संवर्धक खाद का इस्तेमाल मटर, सरसों, बैगन, मूली और गेंदे के फूल पर किया। पिंडरा ब्लॉक के किसान हरिशंकर सिंह ने बताया कि मैंने पहली बार जैविक खाद और संवर्धक खाद के माध्यम से दो हिस्सों में गेहूं लगाया था। जिसमे 10 प्रतिशत अंतर के संवर्धक खाद से हुई उपज अधिक थी। इरी ने पूर्वांचल के 250 एकड़ में खेती के लिए 1500 लीटर जैविक संवर्धक तरल खाद का वितरण पहले चरण के प्रयोग के लिए किया था। जिसमे बनारस सहित गाजीपुर और चंदौली जिलों 100 किसान शामिल थे। इरी के वैज्ञानिक कुछ भी कहने को तैयार नहीं हैं। कई बार संपर्क करने बाद भी जवाब नहीं दिया गया।