छुट्टा पशु नहीं, ढूंढते हैं ‘दुधारू’
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छुट्टा पशुओं की धरपकड़ के नाम पर महज दिखावा होने का दावा करने वाले इसके पीछे वसूली का खेल होने का आरोप लगाते हैं। उनकी मानें तो निजी पशुपालकों के गाय-बछड़े ले जाकर दस्ते के लोग उन्हें छोड़ने के एवज में मनमाना रकम वसूलते हैं। तबले वालों के विरोध से बचने के लिए सड़कों पर जमावड़े के बावजूद भैंस नहीं पकड़ते। सड़कों पर कुत्ते सबसे अधिक दिखेंगे लेेकिन दस्ते ने तीन महीने में एक भी नहीं पकडे़।
नई सड़क, गिरजाघर, गोदौलिया, चितरंजन पार्क, दशाश्वमेध घाट, अंधरापुल, चौक, मैदागिन पर छुट्टा पशुओं का जमावड़ा लगा रहता है। आरपी घाट, शीतला घाट, अस्सीघाट, मानमंदिर, दशाश्वमेध, शीतला घाट, सिंधिया घाट समेत सभी घाटों पर हालात ऐसे ही होते हैं लेकिन इनकी धरपकड़ के लिए वास्तविक रूप से अभियान तभी चलता है जब किसी वीवीआईपी का आगमन होना होता है। छुट्टा पशुओं को पकड़ने और उन्हें रखने की समुचित व्यवस्था भी नगर निगम के पास नहीं है। अर्दली बाजार और नक्खीघाट में बने कांजीहाउसों की क्षमता करीब 30-30 पशुओं के रखने की है।