Diwali 2022: महानिशा काल में सिद्ध होते रहे मंत्र, काशी में एकांत स्थानों पर परवान चढ़ती रही तंत्र विद्या
दिवाली की रात महानिशा काल में मां कालरात्रि की विशेष पूजा संपन्न हुई। गुप्त विद्याओं को जगाने के लिए काशी के महाश्मशान में महानिशा काल में साधकों के पहुंचने का क्रम जारी रहा।
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दिवाली की रात महानिशा काल में मंत्र सिद्ध होते रहे और तंत्र विद्या परवान चढ़ती रही। लोहबान और गुग्गुल की गंध के बीच तंत्र साधकों ने यज्ञ कुंड में मंत्रों की आहुतियां अर्पित कीं। निर्विघ्न रूप से तंत्र साधना को संपन्न करने के लिए एकांत और निर्जन स्थानों पर साधकों ने तंत्र विद्या के अनुष्ठान संपन्न किए।
योगिनी, महाकाली और गुरु मंत्रों को सिद्ध करने का क्रम अनवरत जारी रहा। बलि चढ़ाने के दौरान रोकटोक से बचने के लिए कई जतन किए गए। सोमवार को दीपावली की रात मां कालरात्रि की विशेष पूजा संपन्न हुई। गुप्त विद्याओं को जगाने के लिए काशी के महाश्मशान में महानिशा काल में साधकों के पहुंचने का क्रम जारी रहा।
कालरात्रि को प्रसन्न करने को सात्विक और तामसिक बलि
मध्यरात्रि में कुछ साधकों ने सात्विक ओर कुछ ने तामसी बलि दी। सात्विक बलि में नींबू, कोहड़ा, नारियल की बलि देकर इष्टदेव को प्रसन्न किया गया जबकि तामसी बलि में मुर्गा, बकरा, शराब, उल्लू आदि की बलि चढ़ाकर इष्टदेव को प्रसन्न किया गया। तंत्र-मंत्र का सामान बेचने वाले दुकानदारों की मानें तो महानिशा की रात में उल्लू की हड्डी से भी साधना की जाती है।
तांत्रिकों की मानें तो दीपावली की पूजा-लक्ष्मी गणेश की समर्पित है। देवी लक्ष्मी की सवारी उल्लू है, इस नाते पूजा में उल्लू का विशेष महत्व होता है। वहीं गंगा में जलस्तर बढ़ने के कारण साधकों को निर्जन स्थान की तलाश में काफी मशक्कत करनी पड़ी। गंगा पार रेती जलमग्न होने के कारण साधकों को एकांत व निर्जन स्थान चिन्हित करने में परेशानी हुई।