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सलाखों के पीछे ज्ञान दीप जलाने की मुहिम

Thu, 21 Apr 2016 02:19 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, वाराणसी
ब्यूरो/अमर उजाला, वाराणसी Updated Thu, 21 Apr 2016 02:19 AM IST
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Deep knowledge burn campaign behind bars
आनंद कृष्‍ण (बीच में) अपने दोस्तों के साथ। 
सलाखों के पीछे के अंधेरे को दूर करने की एक नायाब कोशिश। बिना जुर्म के जेल की दीवारों के पीछे गुजरते बचपन को ज्ञान दीप से प्रकाशित करने की ख्वाहिश। जी हां, मां के साथ जेल में बंद बच्चों की दोस्ती एक युवा ने अक्षरों से करा दी है। जेल में कैद ये बच्चे स्कूल का मुंह भले ना देख पाए हों लेकिन अक्षरों से इनका नाता जुड़ने लगा है। यह संभव हुआ है बीएचयू के छात्र आनंद कृष्णा के अभियान ‘लिटिल कृष्णा’ की वजह से।
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बीएचयू के बीए द्वितीय वर्ष के छात्र आनंद कृष्णा ने दो महीने पहले काशी से अपने अभियान ‘लिटिल कृष्णा’ की शुरुआत की थी, जो आज मिर्जापुर, भदोही और गाजीपुर की जेलों तक पहुंचा दिया है। अपनी पढ़ाई के साथ जेल में जाकर बच्चों को पढ़ाना आनंद के लिए मुश्किल था, इसलिए उसने एक तरीका ढूंढा। जेल के बच्चों को पढ़ाने के लिए उसने जेल में ही एजूकेशन ट्रेनर तैयार करना शुरू किया। ये ट्रेनर कोई और नहीं बल्कि जेल में सबसे शिक्षित महिला बंदी हैं। हर 15 दिन पर आनंद अपने भाई श्रीकांत के साथ जाकर वहां की प्रगति भी देखता है।
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इन बच्चों के लिए अपनी पॉकेटमनी और दोस्तों की मदद से आनंद ने कॉपी, किताब, पेंसिल, पेन और खिलौने आदि सामान इकट्ठा कर जेलों में उपलब्ध कराता है। ट्रेनर को भी पढ़ाने के लिए स्टेशनरी का सामान दिया है।
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आनंद ने आईजी जेल को पत्र लिखकर जेलों में महिला बंदियों के साथ रह रहे उनके बच्चों को पढ़ाने के लिए टीचर उपलब्ध कराने की मांग की है। हालांकि अभी इसका उत्तर उसे नहीं मिला। आनंद का कहना है कि इस मामले में वह जेल मंत्री और गृह मंत्री से भी गुजारिश करेगा।



आनंद का कहना है कि इस अभियान का नाम ‘लिटिल कृष्णा’ रखने की खास वजह है। भगवान कृष्ण भी जेल में पैदा हुए थे। बिना किसी जुर्म के जेल की कोठरियों में अपना बचपन गुजार रहे ये बच्चे भी उस बाल कृष्ण का ही रूप हैं। इसीलिए अपने अभियान को यह नाम दिया।

 
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