जज्बा: काशी की बेटियों ने हुनर से लिखा जिंदगी का ‘अफसाना’, संघर्षों के थपेड़े के बीच दे रहीं जिंदगी को नई उड़ान
पिछले 40 साल से माता-पिता के साये के बिना जीने वाली वाराणसी की पीलीकोठी निवासी
दो बहनें मोहल्ले के लोगों के लिए मिसाल हैं। पतंग बनाकर जीवन की गाड़ी चलाने वाली ये बहनें ही एक दूसरे की सहारा हैं।
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मिल सके आसानी से उसकी ख्वाहिश किसे है, जिद तो उसकी है, जो मुकद्दर में लिखा ही नहीं। जिजीविषा और लगन डिग्री नहीं मांगती। ये लाइनें वाराणसी के पीलीकोठी की तंग गलियों में रहने वाली दो बहनों पर के जीवन संघर्ष पर सटीक बैठती हैं। बचपन में इनके सिर से माता-पिता का साया उठ गया था, लेकिन ये बहनें गरीबी के बीच अपने हुनर से जीवन को नई दिशा देने में जुट गईं। ये कहानी है दो सगी बहनों अफसाना और नजीरून बानो की।
बचपन में जब मां-बाप गुजरे तो इन बहनों के सामने पहाड़ जैसी जिंदगी पड़ी थी। दो वक्त की रोटी जुटाने के लिए अफसाना और नजीरून ने खुद ही जिंदगी से जद्दोजहद शुरू दी। मोहल्ले के घरों में जाकर सिलाई-कढ़ाई सीखी। इसके बाद उस हुनर से लोगों के लिए स्वेटर, चादर, मेजपोस, फ्रॉक बनाकर कुछ पैसे जुटाए। इन पैसों से ही अफसाना ने अपनी पढ़ाई भी जारी रखी।
आसपास के लोगों के लिए मिसाल
पिछले 40 साल से माता-पिता के साये के बिना जीने वाली ये बहनें मोहल्ले के लोगों के लिए मिसाल हैं। मोहल्ले वाले इनके हौसले और जिजीविषा की दाद देते हैं। मुफलिसी के थपेड़ों ने इन बेटियों को चट्टान की तरह मजबूत बना दिया है।
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एक दूसरे का सहारा है ये बहनें
पतंग बनाकर जीवन की गाड़ी चलाने वाली ये बहनें ही एक दूसरे की सहारा हैं। 50 वर्षीय नजीरून कहती है अम्मी और अब्बू के जाने के बाद हम दोनों ही एक दूसरे का सहारा बन गए। एक दूसरे का ख्याल रखने के लिए हमने कभी अपने निकाह के बारे में भी नहीं सोचा। वहीं 40 वर्षीय अफसाना कहती हैं मां-बाप के जाने के बाद आपा का हाथ थामें मैंने अपना जीवन बिता दिया।
लोगों को बना रहीं हुनर का साथी
पतंग बनाकर अपनी गाड़ी चलाने वाली ये बहनें सिलाई-कढ़ाई में भी माहिर हैं, अपनी इस कला को वो दूसरों को सीखाकर उनको आत्मनिर्भर बनने का रास्ता दिखा रही हैं। सिलाई-कढ़ाई सीखाने के लिए उन्होंने कोई प्रशिक्षण केंद्र तो नहीं खोला, लेकिन आस-पड़ोस की महिलाओं और लड़कियों को उनके खाली समय में कला सीखाकर उन्हें माहिर जरूर बना रहीं है।