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Daughters Day 2022: कोई खेल में आगे तो कोई देश की रक्षा को मुस्तैद, कोई शिक्षक बन संवार रही दूसरों का भविष्य
Sun, 25 Sep 2022 02:11 PM IST
किरन रौतेला
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, वाराणसी
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, वाराणसी
Published by: किरन रौतेला
Updated Sun, 25 Sep 2022 02:11 PM IST
सार
परिवार से बेटियों का रिश्ता बहुत खास होता है। वैसे मानो तो हर दिन बेटियों का ही होता है। लेकिन कई दिन ऐसे होते हैं जो स्पेशल बेटियों को समर्पित होते हैं। जैसे इंटरनेशनल डॉटर्स डे। आज डॉटर्स डे है। हर साल सितंबर के चौथे रविवार के दिन इंटरनेशनल डॉटर्स डे मनाया जाता है।
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गांव से निकल कर पैरामिलिट्री तक का सफर
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
हौसला, लगन, मेहनत और खुद पर भरोसा हो तो कोई भी मुश्किल लक्ष्य पाने से रोक नहीं सकती। अपने जीवन को तपस्या बनाकर सफलता की राह पर आगे बढ़ने वाली बेटियाें का संघर्ष दूसरों के लिए प्रेरणादायी साबित होता है। बनारस में कई ऐसी बेटियां हैं जिन्होंने अभाव और आर्थिक तंगी से जूझते हुए एक मुकाम हासिल किया है। 25 सितंबर को डॉटर्स डे के मौके पर अमर उजाला कुछ ऐसी ही बेटियों की कहानियां आपके सामने पेश कर रहा है, जिन्होंने अपने संघर्ष के बूते सफलता के क्षितिज पर अचूक ‘निशाना’ साधा और कामयाबी की इबारत लिख डाली।
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गांव से निकल कर पैरामिलिट्री तक का सफर
चिरईगांव के मुस्तफाबाद के किसान प्रदीप यादव की बेटी प्रीति यादव गांव की गलियों से निकलकर आज पैरामिलिट्री तक का सफर तय कर चुकी हैं। खेत, खलिहानों में पिता के साथ काम के दौरान प्रीति ने कभी नहीं सोचा था कि वो कभी विदेश भी जा सकेंगी। लेकिन अपने हौसले और हिम्मत से आज वो भारतीय पैरामिलिट्री फोर्स का हिस्सा बन अफ्रीका के कांगो में अपनी काबिलियत का लोहा मनवा रहीं हैं। गांव के सरकारी स्कूल से पढ़ाई करने के बाद प्रीति ने महादेवी पीजी कॉलेज से स्नातक किया, इग्नू से परास्नातक करने के दौरान प्रीति का चयन पैरामिलिट्री में हो गया। प्रीति के पिता प्रदीप बताते हैं कि बचपन से प्रीति का सपना एक फौजी बनने का था। असम राइफल्स में चयन के बाद 2017 में प्रीति का चयन यूएन पीस कीपिंग फोर्स के लिए हो गया। नौकरी के दौरान वर्ष 2019 में गणतंत्र दिवस परेड का हिस्सा भी बनी।
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कभी खाने को नहीं थे पैसे, आज विदेशों में लहरा रही परचम
- फोटो : अमर उजाला
कभी खाने को नहीं थे पैसे, आज विदेशों में लहरा रही परचम
प्रह्लाद घाट निवासी रमाशंकर व बिंदु पांडेय की सबसे छोटी बेटी गौरी पांडेय देश के लिए भले ही अनजानी हों, लेकिन खेल जगत में चर्चित चेहरा हैं। यहां तक पहुंचने के लिए गौरी ने काफी संघर्ष किया है। गौरी ने मुफलिसी का ऐसा दौर भी देखा जब घर में एक रुपया नहीं होता था। पापा घाट पुरोहित हैं। यजमान मिले तो चूल्हा जलता था, नहीं तो गंगा मईया का पानी तो है ही। गौरी बताती हैं कि पढ़ाई से ज्यादा वेटलिफ्टिंग का क्रेज था। शरीर में ताकत के लिए प्रोटीन युक्त आहार की कमी थी। जब वेटलिफ्टिंग में जा रही थी तो मेरे पास आईकार्ड बनवाने व किराये के लिए पैसे नहीं थे। लोगों की मदद से छोटी-छोटी प्रतियोगिताओं से होते हुए वर्ष 2014 में हरियाणा में आयोजित नेशनल गेम्स में पहुंची, जहां कांस्य पदक मिला। यूथ कॉमनवेल्थ गेम्स में गोल्ड मेडल मिला। यूथ नेशनल में जीत मिलने के बाद हौसला बढ़ा। आज भी उसी लगन और मेहनत से अभ्यास कर रही हूं। अब आसमां छूने की हसरत छोटी नहीं लगती।
प्रह्लाद घाट निवासी रमाशंकर व बिंदु पांडेय की सबसे छोटी बेटी गौरी पांडेय देश के लिए भले ही अनजानी हों, लेकिन खेल जगत में चर्चित चेहरा हैं। यहां तक पहुंचने के लिए गौरी ने काफी संघर्ष किया है। गौरी ने मुफलिसी का ऐसा दौर भी देखा जब घर में एक रुपया नहीं होता था। पापा घाट पुरोहित हैं। यजमान मिले तो चूल्हा जलता था, नहीं तो गंगा मईया का पानी तो है ही। गौरी बताती हैं कि पढ़ाई से ज्यादा वेटलिफ्टिंग का क्रेज था। शरीर में ताकत के लिए प्रोटीन युक्त आहार की कमी थी। जब वेटलिफ्टिंग में जा रही थी तो मेरे पास आईकार्ड बनवाने व किराये के लिए पैसे नहीं थे। लोगों की मदद से छोटी-छोटी प्रतियोगिताओं से होते हुए वर्ष 2014 में हरियाणा में आयोजित नेशनल गेम्स में पहुंची, जहां कांस्य पदक मिला। यूथ कॉमनवेल्थ गेम्स में गोल्ड मेडल मिला। यूथ नेशनल में जीत मिलने के बाद हौसला बढ़ा। आज भी उसी लगन और मेहनत से अभ्यास कर रही हूं। अब आसमां छूने की हसरत छोटी नहीं लगती।
डॉटर्स डे स्पेशल
- फोटो : अमर उजाला
आईआईटी की नौकरी छोड़ शुरू किया खुद का बिजनेस
पर्यावरण विज्ञान से परास्नातक करने के बाद शिखा को अपने प्रोजेक्ट और नौकरी के चलते गांवों की समस्याओं के बारे में करीब से जानने का मौका मिला। आईआईटी मद्रास में अपनी नौकरी के दौरान वह कई छोटे-बड़े उद्यमियों से मिलीं और स्टार्टअप की चुनौतियों के बारे में समझा। फिर क्या था, शिखा नौकरी छोड़कर अपने शहर बनारस आ गईं और स्क्रैपशाला शुरू करने की योजना बनाई। बचपन से ही उन्होंने अपनी मां को कबाड़ की चीजें रिसाइकल करते देखा था। मां के इस काम से शिखा को उनकी स्टार्ट अप की प्रेरणा मिली। शिखा बताती हैं कि उनके स्टार्ट अप को लेकर काफी चुनौतियां सामने आईं। पहले घर में किसी ने तुरंत हां नहीं की थी। फिर पुराने सामान और कचरे को नए रूप में लाना भी आसान नहीं था। कारीगर और मैटेरियल के साथ उत्पादों की बिक्री को लेकर दिक्कतें आईं। जब उत्पाद पसंद किए गए, तो सबका सहयोग मिला। जनवरी में शिखा ने सोनी टीवी के शार्क टैंक इंडिया शो में भी हिस्सा ले चुकी हैं।
पर्यावरण विज्ञान से परास्नातक करने के बाद शिखा को अपने प्रोजेक्ट और नौकरी के चलते गांवों की समस्याओं के बारे में करीब से जानने का मौका मिला। आईआईटी मद्रास में अपनी नौकरी के दौरान वह कई छोटे-बड़े उद्यमियों से मिलीं और स्टार्टअप की चुनौतियों के बारे में समझा। फिर क्या था, शिखा नौकरी छोड़कर अपने शहर बनारस आ गईं और स्क्रैपशाला शुरू करने की योजना बनाई। बचपन से ही उन्होंने अपनी मां को कबाड़ की चीजें रिसाइकल करते देखा था। मां के इस काम से शिखा को उनकी स्टार्ट अप की प्रेरणा मिली। शिखा बताती हैं कि उनके स्टार्ट अप को लेकर काफी चुनौतियां सामने आईं। पहले घर में किसी ने तुरंत हां नहीं की थी। फिर पुराने सामान और कचरे को नए रूप में लाना भी आसान नहीं था। कारीगर और मैटेरियल के साथ उत्पादों की बिक्री को लेकर दिक्कतें आईं। जब उत्पाद पसंद किए गए, तो सबका सहयोग मिला। जनवरी में शिखा ने सोनी टीवी के शार्क टैंक इंडिया शो में भी हिस्सा ले चुकी हैं।
डॉटर्स डे स्पेशल
- फोटो : अमर उजाला
संयुक्त राष्ट्र तक पहुंच बढ़ाया देश का मान
मंजिल हासिल की जा सकती है, बस हौसला जिंदा रहना चाहिए। दौलतपुर निवासी विशाखा अग्रवाल ने मुफलिसी में भी अपने सपने से समझौता नहीं किया। बल्कि दोगुनी मेहनत कर माता-पिता और खुद के सपने को पूरा किया। माता पिता बड़े-बड़े कोचिंग संस्थान की मोटी फीस भरने में असमर्थ थे। आईसीएसई दसवीं की परीक्षा में जिले में तीसरा स्थान हासिल करने के बाद विशाखा का सपना इंजीनियर बनने का था। इसके लिए वो अच्छी कोचिंग से तैयारी चाहती थी, लेकिन परिवार की आर्थिक स्थिति ठीक न होने के कारण माता-पिता उसकी इस ख्वाहिश को पूरा नहीं कर सके। फिर भी विशाखा ने अपना हौसला टूटने नहीं दिया। 12वीं की पढ़ाई के दौरान रात-रात तक बैठकर खुद से इंजीनियरिंग प्रवेश परीक्षा की तैयारी करतीं रहीं। अपनी मेहनत की बदौलत वो आईआईटी क्रैक इंजीनियरिंग के बाद वर्तमान में ट्रिपल आइटी दिल्ली से प्री डॉक्टोरल फेलोशिप कर रही है। विशाखा के टैलेंट देखते हुए उन्हें न्यूयार्क में संयुक्त राष्ट्र संघ जाने का मौका मिला। वहां वह यूएन विमेन की कार्यकारी निदेशक के समक्ष गर्ल्स बिल ऑफ राइट्स प्रस्तुत कर चुकी हैं।
मंजिल हासिल की जा सकती है, बस हौसला जिंदा रहना चाहिए। दौलतपुर निवासी विशाखा अग्रवाल ने मुफलिसी में भी अपने सपने से समझौता नहीं किया। बल्कि दोगुनी मेहनत कर माता-पिता और खुद के सपने को पूरा किया। माता पिता बड़े-बड़े कोचिंग संस्थान की मोटी फीस भरने में असमर्थ थे। आईसीएसई दसवीं की परीक्षा में जिले में तीसरा स्थान हासिल करने के बाद विशाखा का सपना इंजीनियर बनने का था। इसके लिए वो अच्छी कोचिंग से तैयारी चाहती थी, लेकिन परिवार की आर्थिक स्थिति ठीक न होने के कारण माता-पिता उसकी इस ख्वाहिश को पूरा नहीं कर सके। फिर भी विशाखा ने अपना हौसला टूटने नहीं दिया। 12वीं की पढ़ाई के दौरान रात-रात तक बैठकर खुद से इंजीनियरिंग प्रवेश परीक्षा की तैयारी करतीं रहीं। अपनी मेहनत की बदौलत वो आईआईटी क्रैक इंजीनियरिंग के बाद वर्तमान में ट्रिपल आइटी दिल्ली से प्री डॉक्टोरल फेलोशिप कर रही है। विशाखा के टैलेंट देखते हुए उन्हें न्यूयार्क में संयुक्त राष्ट्र संघ जाने का मौका मिला। वहां वह यूएन विमेन की कार्यकारी निदेशक के समक्ष गर्ल्स बिल ऑफ राइट्स प्रस्तुत कर चुकी हैं।
डॉटर्स डे स्पेशल
- फोटो : अमर उजाला
खुद की पढ़ाई के लिए नौकरी कर जुटाया पैसा
अगर इंसान पूरे दिल से मेहनत करें तो वो कुछ भी कर सकता है। इसी जोश और जज्बे के साथ खोजवां निवासी काजल ने अपनी सफलता की कहानी लिखी। काजल की मां ने बेटी की पढ़ाई के लिए एक समय दूसरों के घर में काम भी किया। जिसकी बदौलत आज उनकी बेटी उत्तर प्रदेश माध्यमिक शिक्षा सेवा चयन आयोग की परीक्षा उत्तीर्ण कर कासगंज जिले में समाजशास्त्र प्रवक्ता पद पर कार्यरत है। यहां तक पहुंचने के लिए काजल ने खुद एक फिजियोथेरेपी सेंटर में काम करने के साथ ट्यूशन पढ़ाकर अपनी पढ़ाई की फीस जुटाई। बीएचयू से स्नातक व परास्नातक करने के दौरान वह साक्षर इंडिया फाउंडेशन से जुड़ीं। काजल ने बताया कि यहां डॉ. सुनील व स्वाति मिश्रा के मार्गदर्शन में जेआरएफ की तैयारी शुरू की। 2017 में नेट उत्तीर्ण करने के बाद मैंने ठान लिया कि मैं अब सरकारी नौकरी ही करूंगी। मेहनत और लगन के साथ मैंने पीजीटी की तैयारी कर परीक्षा दी। जिसकी बदौलत आज मैं समाजशास्त्र प्रवक्ता के रूप में कार्यरत हूं।
अगर इंसान पूरे दिल से मेहनत करें तो वो कुछ भी कर सकता है। इसी जोश और जज्बे के साथ खोजवां निवासी काजल ने अपनी सफलता की कहानी लिखी। काजल की मां ने बेटी की पढ़ाई के लिए एक समय दूसरों के घर में काम भी किया। जिसकी बदौलत आज उनकी बेटी उत्तर प्रदेश माध्यमिक शिक्षा सेवा चयन आयोग की परीक्षा उत्तीर्ण कर कासगंज जिले में समाजशास्त्र प्रवक्ता पद पर कार्यरत है। यहां तक पहुंचने के लिए काजल ने खुद एक फिजियोथेरेपी सेंटर में काम करने के साथ ट्यूशन पढ़ाकर अपनी पढ़ाई की फीस जुटाई। बीएचयू से स्नातक व परास्नातक करने के दौरान वह साक्षर इंडिया फाउंडेशन से जुड़ीं। काजल ने बताया कि यहां डॉ. सुनील व स्वाति मिश्रा के मार्गदर्शन में जेआरएफ की तैयारी शुरू की। 2017 में नेट उत्तीर्ण करने के बाद मैंने ठान लिया कि मैं अब सरकारी नौकरी ही करूंगी। मेहनत और लगन के साथ मैंने पीजीटी की तैयारी कर परीक्षा दी। जिसकी बदौलत आज मैं समाजशास्त्र प्रवक्ता के रूप में कार्यरत हूं।
बनारस की रेबी पाल
- फोटो : अमर उजाला
तानों को दरकिनार कर रेवी पाल ने खुद बनाया अपना रास्ता
छितौना गांव की रेवी पाल ने दौड़ में अबतक एक दर्जन से अधिक गोल्ड मेडल हासिल करने के साथ ही अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर मलेशिया में 1500 मीटर दौड़ में सिल्वर मेडल देश के नाम कर अन्तर्राष्ट्रीय स्तर अपनी धाक जमा चुकी ।गांव की गलियों से निकल आर्थिक तंगी से जूझ रहे परिवार की बेटी अन्तर्राष्ट्रीय धाविका के रूप में पहचान बना चुकी है। 2013 में पिता की मृत्य के बाद परिवार की माली हालत पहले से और खराब हो गई।एक भाई और तीन बहनों में सबसे छोटी रेबी पाल पढ़ाई के साथ एथलीट की तैयारी करना शुरू किया तो लोगों ने तरह तरह के शब्द बाणों से उसका हौसला तोड़ने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ा। अभ्यास के दौरान डाइट को लेकर खर्च बढ़ने लगा, परिवार की माली हालत खराब होने के बावजूद भाई अरुन मदद करता रहा।
खेल और प्रतिभा की बदौलत रेबि पाल का चयन रेलवे में हो गया है। उनके खेल प्रशिक्षक संजीव श्रीवास्तव ने बताया कि खेलो इंडिया में नेशनल गोल्ड मेडल, स्कूली गेम नेशलन गोल्ड मेडल, आल इंडिया क्रॉस कंट्री में गोल्ड मेडल, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मलेशिया में 1500 मीटर में सिल्वर मेडल एवं अंडर 23 नेशनल गोल्ड मेडल के साथ अबतक 13 गोल्ड मेडल हासिल कर चुकी है। वर्तमान में वो भारतीय खेल प्राधिकरण हॉस्टल में रहकर क्रॉस कंट्री की तैयारी कर रही हैं।
छितौना गांव की रेवी पाल ने दौड़ में अबतक एक दर्जन से अधिक गोल्ड मेडल हासिल करने के साथ ही अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर मलेशिया में 1500 मीटर दौड़ में सिल्वर मेडल देश के नाम कर अन्तर्राष्ट्रीय स्तर अपनी धाक जमा चुकी ।गांव की गलियों से निकल आर्थिक तंगी से जूझ रहे परिवार की बेटी अन्तर्राष्ट्रीय धाविका के रूप में पहचान बना चुकी है। 2013 में पिता की मृत्य के बाद परिवार की माली हालत पहले से और खराब हो गई।एक भाई और तीन बहनों में सबसे छोटी रेबी पाल पढ़ाई के साथ एथलीट की तैयारी करना शुरू किया तो लोगों ने तरह तरह के शब्द बाणों से उसका हौसला तोड़ने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ा। अभ्यास के दौरान डाइट को लेकर खर्च बढ़ने लगा, परिवार की माली हालत खराब होने के बावजूद भाई अरुन मदद करता रहा।
खेल और प्रतिभा की बदौलत रेबि पाल का चयन रेलवे में हो गया है। उनके खेल प्रशिक्षक संजीव श्रीवास्तव ने बताया कि खेलो इंडिया में नेशनल गोल्ड मेडल, स्कूली गेम नेशलन गोल्ड मेडल, आल इंडिया क्रॉस कंट्री में गोल्ड मेडल, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मलेशिया में 1500 मीटर में सिल्वर मेडल एवं अंडर 23 नेशनल गोल्ड मेडल के साथ अबतक 13 गोल्ड मेडल हासिल कर चुकी है। वर्तमान में वो भारतीय खेल प्राधिकरण हॉस्टल में रहकर क्रॉस कंट्री की तैयारी कर रही हैं।