दालमंडी: तवायफों, तस्करों, फुटबॉल और गैंगवार की गवाह तंग गलियां; पढ़ें काशी की रोचक जानकारी
Varanasi News: पूर्व पार्षद मोहम्मद शाहिद अली मुन्ना ने बताया कि दालमंडी का एक और ऐतिहासिक पहलू भी है। मुसाफिरखाने से लगी गली में कभी पुरानी अदालत लगती थी, जहां अंग्रेज सजा सुनाया करते थे। इसी इलाके में पूर्वांचल के पहले नोटरी वकील हैदर मिर्जा एडवोकेट भी रहे। कहा जाता है कि उन्हें तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने नोटरी नियुक्त कराया था। दोनों के बीच गहरी दोस्ती थी। दालमंडी को नई सड़क चौराहे से लेकर रफीक लस्सी वाले तक इसका पहला हिस्सा माना जाता था, जबकि दूसरा हिस्सा बाटा शोरूम तक फैला था। अब यह बाजार कई हिस्सों में बंट चुका है।
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काशी की पुरानी गलियों में अगर कोई इलाका अपने भीतर सबसे ज्यादा किस्से, कारोबार, रंग, रुतबा, संगीत, सियासत और बदनामी समेटे हुए है, तो वह दालमंडी है। आज यहां दुकानों की चमक, भीड़, चूड़ियों की खनक, क्रॉकरी के बाजार और तंग गलियों में उमड़ती भीड़ दिखाई देती है, लेकिन एक समय ऐसा भी था जब रात ढलते ही यहां सारंगी गूंजती थी, तबले बजते थे और कोठों पर मुजरे सजते थे।
अंग्रेज इसे डॉलमंडी कहा करते थे। वजह थी यहां के कोठे और तवायफों की दुनिया। आजादी के बाद धीरे-धीरे लोगों ने इसे दालमंडी कहना शुरू कर दिया। हालांकि, इसका एक दूसरा नाम भी रहा, हकीम काजिम अली रोड। इलाके के मशहूर हकीम काजिम अली के नाम पर आज भी यहां बोर्ड लगा दिखाई देता है।
इमरजेंसी लगने से पहले तक यहां देह व्यापार खुले तौर पर चलता था। इलाके में कई बड़ी तवायफें थीं, जिनके संबंध सिर्फ आम ग्राहकों तक सीमित नहीं थे। पूर्वांचल और बिहार के कई माफिया, बाहुबली और रसूखदार लोग इन तवायफों को अपनी निजी जिंदगी का हिस्सा बनाए रखते थे। उनके खर्च उठाते थे और बदले में वह तवायफ सिर्फ उसी व्यक्ति तक सीमित रहती थी।
गैंगवार और अपराध की दुनिया में भी इन तवायफों की बड़ी भूमिका होती थी। कई बार गैंगवार के बाद अपराधियों को कोठों पर शरण मिलती थी। उस दौर में दालमंडी सिर्फ संगीत और मुजरे की जगह नहीं थी, बल्कि सत्ता, अपराध और पैसे के गठजोड़ का बड़ा केंद्र भी थी। फिर आया 1975 का दौर। उस समय इंस्पेक्टर रंजीत सिंह ने यहां के कोठों को खाली कराने का अभियान चलाया। तब तक करीब 20 बड़े कोठे ही बचे थे।
स्थानीय व्यापारी और आसपास रहने वाले लोग पहले से ही इस माहौल से असहज थे, इसलिए विरोध भी बहुत ज्यादा नहीं हुआ। धीरे-धीरे कोठों की दुनिया खत्म होने लगी। कोठों के बंद होने के साथ वह रईस तबका, जो रातों में यहां संगीत सुनने आता था, कहीं और चला गया। उसी दौरान एक तबका मंडुवाडीह की ओर शिफ्ट हो गया, जबकि कई रसूखदार लोगों ने गांवों और अपने इलाकों में निजी नाच-गाने का इंतजाम शुरू कर दिया।
दालमंडी सिर्फ तवायफों या व्यापार की वजह से ही मशहूर नहीं रही। यह फुटबॉल खिलाड़ियों का भी बड़ा गढ़ रही है। यहां से कई ऐसे खिलाड़ी निकले, जिन्होंने राष्ट्रीय और प्रदेश स्तर पर पहचान बनाई। मरहूम नसीम इंडिया, शम्मू और अख्तर अली जैसे खिलाड़ी भारत के लिए खेले। वहीं नूर आलम, अन्नू खां, राणा, शमशाद, शाहिद बेलग्रामी, शिप्पे हसन शिप्पू और सलीम जैसे खिलाड़ी उत्तर प्रदेश की टीम का हिस्सा रहे। कहा जाता है कि मंडल स्तर पर खेलने वाले खिलाड़ियों की संख्या सौ से भी ज्यादा थी। तंग गलियों और भीड़भाड़ के बीच फुटबॉल का यह जुनून दालमंडी की अलग पहचान बन गया था।
दालमंडी की पहचान उसके अजीबोगरीब किरदारों से भी रही है। यहां का भिंडी चाय वाला अपने गुस्से और गालियों के लिए मशहूर था। रात के दो बजे तक उसकी दुकान पर व्यापारी, पत्रकार और राजनीति से जुड़े लोग जमा रहते थे। लोग चाय कम और उसकी गालियां ज्यादा सुनने आते थे। इसी तरह अकबर पाया वाला और गुलाम रसूल पकौड़ी वाले की दुकानें भी मशहूर थीं।
ग्राहकों को डांटना, गालियां देना और फिर उसी अंदाज में खाना परोसना उनकी पहचान बन चुकी थी। 1980 का एक गैंगवार आज भी इलाके में कहानी की तरह सुनाया जाता है। बताया जाता है कि हमला करने आए बदमाश ने बम फेंका, लेकिन वह दीवार से टकराकर वापस उसी की ओर आ गिरा और फट गया। इसमें हमलावर की मौत हो गई। बाकी दो लोग भी इस संघर्ष में मारे गए। यह घटना लंबे समय तक दालमंडी की चर्चा का हिस्सा बनी रही।