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गगन घनघोर घन घुमड़ घिरि आए...
ब्यूरो/अमर उजाला, वाराणसी
Updated Wed, 13 Jul 2016 01:59 AM IST
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वसंत ऋतुराज है तो पावस ऋतुओं की रानी। इसके आगमन में शोर, कोलाहल और विरह भरा होता है। भारतीय संगीत प्रकृति के अत्यंत निकट राग-रंग में रचा-बसा है। रागों के स्वर प्रकृति की विभिन्न ध्वनियों, छटाओं, घटाओं और रूपों के प्रतिफल के रूप में नजर आते हैं। कुछ राग ऊषाकाल के मन की चेतना को अभिव्यक्त करते हैं तो कुछ सांझ के विषाद-अवसाद को। कुछ राग रात की गहराई में डूब कर भावनाओं की गहनतम अभिव्यक्ति तक ले जाते हैं। इसमें ऋतुकालीन रागों का अपना अलग प्रेम-माधुर्य है। वर्षा ऋतु लोक और शास्त्र दोनों में प्रेमालाप का चरमोत्कर्ष लेकर आती है। ऐसे घटाएं घिरती हैं तो मल्हार प्रियतम से संवाद स्थापित करने की कड़ी बन जाता है।
एक ओर पावस की फुहार से कजरी के स्वरों पर मन के भीतर तक भींगने के साथ ही विरह वेदना की अभिव्यक्ति शुरू हो जाती है तो दूसरी ओर मल्हार के विविध आयामों में घटाओं की पीड़ा छा जाती है। यह कहना है कि प्रसिद्ध ख्याल गायक पं. देवाशीष डे का। वह कहते हैं कि प्रचंड गरमी के बाद गरज के साथ जैसे ही फुहारें धरती पर पड़ने लगती हैं, मन के सारे कपाट खुल जाते हैं। विरहिनियां तन को सराबोर करने के लिए निकल पड़ती हैं। कहीं झूले पड़ जाते हैं तो कहीं तन से मन तक का शृंगार शुरू हो जाता है। घटाओं के माध्यम से या फिर मल्हार और कजरी के स्वरों से, यह बाहर से भीतर तक भीगने के अहसास को बटोरने या महसूस करने के लिए होता है। वह मल्हार की बंदिश को स्वर देते हैं- नाचे मन मयूर मोरा/ तिगदिग थेईता तिगदिग थेईता...। उनका कहना है कि पावस रागों की सुधावृष्टि से मन मयूर हो नाचने लगता है। मयूर की आंखें मंद नुपूर ध्वनि पर मटकने लगती हैं। विरहिनी पपिहरा की पीउ-पीउ की पुकार पर पागल हो इधर-उधर भटकने लगती है।
देवाशीष बताते हैं कि वर्षाऋतु में चातक की व्याकुलता विरहिनी की तरह ही होती है। जब तक घटाओं की बूंदे नहीं धरती पर नहीं टपकतीं तबतक चातक की प्यास नहीं बुझती। फिर वह मल्हार की अपनी रचना पर आलाप लेते हैं-मोतियन बूंद पड़े/मोरे अंगना/चातक मन की प्यास बुझाओ/अगन हिया की ताप बुझाओ/सूखे मन हरियाली लाओ/झिर-झिर बरसे मोरे नैना...। दादुर, मोर, पहीहे के विरहाकुल स्वरों का मल्हार में बखूबी प्रयोग मिलता है। रामदासी मल्हार की इस बंदिश पर नजर डालिए-मोरवा बोले पपीहा पुकारे/दादुरवा बोलावे बादर कारे छाए...। वह बताते हैं कि वैसे तो इस ऋतु में गाए जाने वाले मल्हार के 40-50 प्रकार मिलते हैं। वर्षाकाल के कुछ के रचित रागों नटवर मल्हार, छाया लग मल्हार, पावस मल्हार की विशेषताओं को भी वह बयां करते हैं। वह बंदिश गुनगुनाते हैं- गगन घनघोर घन घुमड़ घिरि आए/नवल घनश्याम संग राधिका मन मगन/सघन वन चले पवन/अतही हरषाए मन/निरख सुख चराचर /मुदित मन धन्य धन...। देवाशीष बताते हैं कि मल्हार का एक और रूप भी है जिसमें उमड़ते-घुमड़ते बादल को घनश्याम और प्यासी सूखी धरती तो विरहिनी राधा के रूप में देखा जाता है। तड़पती धरती के रूप में राधा प्रेम पाने के लिए व्याकुल दिखती है तो सलोना श्याम प्रेमवृष्टि से राधिका को भिगोने के लिए आतुर हो जाता है।
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एक ओर पावस की फुहार से कजरी के स्वरों पर मन के भीतर तक भींगने के साथ ही विरह वेदना की अभिव्यक्ति शुरू हो जाती है तो दूसरी ओर मल्हार के विविध आयामों में घटाओं की पीड़ा छा जाती है। यह कहना है कि प्रसिद्ध ख्याल गायक पं. देवाशीष डे का। वह कहते हैं कि प्रचंड गरमी के बाद गरज के साथ जैसे ही फुहारें धरती पर पड़ने लगती हैं, मन के सारे कपाट खुल जाते हैं। विरहिनियां तन को सराबोर करने के लिए निकल पड़ती हैं। कहीं झूले पड़ जाते हैं तो कहीं तन से मन तक का शृंगार शुरू हो जाता है। घटाओं के माध्यम से या फिर मल्हार और कजरी के स्वरों से, यह बाहर से भीतर तक भीगने के अहसास को बटोरने या महसूस करने के लिए होता है। वह मल्हार की बंदिश को स्वर देते हैं- नाचे मन मयूर मोरा/ तिगदिग थेईता तिगदिग थेईता...। उनका कहना है कि पावस रागों की सुधावृष्टि से मन मयूर हो नाचने लगता है। मयूर की आंखें मंद नुपूर ध्वनि पर मटकने लगती हैं। विरहिनी पपिहरा की पीउ-पीउ की पुकार पर पागल हो इधर-उधर भटकने लगती है।
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देवाशीष बताते हैं कि वर्षाऋतु में चातक की व्याकुलता विरहिनी की तरह ही होती है। जब तक घटाओं की बूंदे नहीं धरती पर नहीं टपकतीं तबतक चातक की प्यास नहीं बुझती। फिर वह मल्हार की अपनी रचना पर आलाप लेते हैं-मोतियन बूंद पड़े/मोरे अंगना/चातक मन की प्यास बुझाओ/अगन हिया की ताप बुझाओ/सूखे मन हरियाली लाओ/झिर-झिर बरसे मोरे नैना...। दादुर, मोर, पहीहे के विरहाकुल स्वरों का मल्हार में बखूबी प्रयोग मिलता है। रामदासी मल्हार की इस बंदिश पर नजर डालिए-मोरवा बोले पपीहा पुकारे/दादुरवा बोलावे बादर कारे छाए...। वह बताते हैं कि वैसे तो इस ऋतु में गाए जाने वाले मल्हार के 40-50 प्रकार मिलते हैं। वर्षाकाल के कुछ के रचित रागों नटवर मल्हार, छाया लग मल्हार, पावस मल्हार की विशेषताओं को भी वह बयां करते हैं। वह बंदिश गुनगुनाते हैं- गगन घनघोर घन घुमड़ घिरि आए/नवल घनश्याम संग राधिका मन मगन/सघन वन चले पवन/अतही हरषाए मन/निरख सुख चराचर /मुदित मन धन्य धन...। देवाशीष बताते हैं कि मल्हार का एक और रूप भी है जिसमें उमड़ते-घुमड़ते बादल को घनश्याम और प्यासी सूखी धरती तो विरहिनी राधा के रूप में देखा जाता है। तड़पती धरती के रूप में राधा प्रेम पाने के लिए व्याकुल दिखती है तो सलोना श्याम प्रेमवृष्टि से राधिका को भिगोने के लिए आतुर हो जाता है।
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