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Varanasi News: काशी की चेतना इंसान को मैं से हम की तरफ ले जाती है
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काशी की सांस्कृतिक चेतना इंसान को मैं से हम की ओर ले जाती है। हम की भावना से समष्टि और सर्व कल्याण का भाव विकसित होता है। काशी के शिव मंदिरों में पंचदेव परंपरा, काशी की उत्सवधर्मिता, संत कबीर और तुलसीदास की परंपरा भी दिखती है। ये बातें बीएचयू के पूर्व मूर्ति विज्ञानी प्रो. मारुति नंदन प्रसाद तिवारी ने मंगलवार को महिला महाविद्यालय की एक कार्यशाला में कही।
सात दिन के इस कार्यक्रम में काशी के प्राचीन मंदिरों, स्थापत्य कला, चित्रकला, जैन व बौद्ध विरासत, जल-तीर्थों, संग्रहालयों के साथ ही सांगीतिक विरासत जगहों की बात की गई। मुख्य अतिथि कुलपति प्रो. अजित कुमार चतुर्वेदी ने कहा कि सांस्कृतिक विरासत स्थिर वस्तु नहीं, जीवंत प्रक्रिया है। समय के साथ नई धाराएं जुड़ती हैं। सांस्कृतिक प्रवाह की दिशा भी बदलती रहती है। किसी अच्छे अकादमिक कार्यक्रम की सफलता इस बात में है कि प्रतिभागी वहां से कोई नई समझ, नया विचार या नया प्रश्न लेकर जाए। शोध का महत्व केवल उसके तत्काल लाभ से नहीं आंका जाए।
प्रो. मारुति नंदन प्रसाद तिवारी ने कहा कि काशी ऐसा स्थान है, जहां व्यक्ति को अपने अंदर के प्रकाश को जानने के कई मौके मिलते हैं। काशी की विरासत को सिर्फ उसके ऐतिहासिक स्थलों से नहीं, बल्कि उसके पीछे निहित ज्ञान, चिंतन और जीवन-दृष्टि से समझना जरूरी है। प्राचार्य प्रो. रीता सिंह ने विद्यार्थियों के साथ संवाद किया। डॉ. आभा मिश्रा पाठक की लिखी किताब सांस्कृतिक पर्यटन की दृष्टि से काशी का लोकार्पण भी किया गया। इस पुस्तक के लेखन में डॉ. रामबाबू श्रीवास्तव भी शामिल हैं।
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सात दिन के इस कार्यक्रम में काशी के प्राचीन मंदिरों, स्थापत्य कला, चित्रकला, जैन व बौद्ध विरासत, जल-तीर्थों, संग्रहालयों के साथ ही सांगीतिक विरासत जगहों की बात की गई। मुख्य अतिथि कुलपति प्रो. अजित कुमार चतुर्वेदी ने कहा कि सांस्कृतिक विरासत स्थिर वस्तु नहीं, जीवंत प्रक्रिया है। समय के साथ नई धाराएं जुड़ती हैं। सांस्कृतिक प्रवाह की दिशा भी बदलती रहती है। किसी अच्छे अकादमिक कार्यक्रम की सफलता इस बात में है कि प्रतिभागी वहां से कोई नई समझ, नया विचार या नया प्रश्न लेकर जाए। शोध का महत्व केवल उसके तत्काल लाभ से नहीं आंका जाए।
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प्रो. मारुति नंदन प्रसाद तिवारी ने कहा कि काशी ऐसा स्थान है, जहां व्यक्ति को अपने अंदर के प्रकाश को जानने के कई मौके मिलते हैं। काशी की विरासत को सिर्फ उसके ऐतिहासिक स्थलों से नहीं, बल्कि उसके पीछे निहित ज्ञान, चिंतन और जीवन-दृष्टि से समझना जरूरी है। प्राचार्य प्रो. रीता सिंह ने विद्यार्थियों के साथ संवाद किया। डॉ. आभा मिश्रा पाठक की लिखी किताब सांस्कृतिक पर्यटन की दृष्टि से काशी का लोकार्पण भी किया गया। इस पुस्तक के लेखन में डॉ. रामबाबू श्रीवास्तव भी शामिल हैं।
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