चलत पुरवाई सननन सनन सन...
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ख्याल गायक डॉ. राजेश्वर आचार्य कहते हैं कि वैशाख, जेठ दग्धता उत्पन्न करता है। उस तड़प की प्यास को आषाढ़ के अलावा और कोई नहीं बुझा सकता। आषाढ़ के मेघों को देखने के लिए कालिदास जैसा मन होना चाहिए। जब आषाढ़ के बादल छाते हैं, जब धरती गदरा जाती है तब जुबान पर बंदिश आती है- उमड़ घुमड़ घन बरसे बदरा/चलत पुरवाई सननन सनन सन...। मेघों की ओर निहार कर राग मल्हार की इस बंदिश को वह स्वर देने में जुट जाते हैं। कहते हैं कि आषाढ़ तर कर देता है। भीतर तक। भीगने -भिगोने की तरावट लेकर आषाढ़ आता है।
यूं ही यक्ष ने आषाढ़ के मेघों को अलकापुरी में अपनी प्रियतमा के पास संदेशवाहक बनाकर नहीं भेजा होगा...। फिर वह मल्हार की दूसरी बंदिश में आलाप लेने लगते हैं। प्रणव घन घनश्याम छाए/भाव गगन जस राधिका नयन में...। वह कहते हैं कि आषाढ़ लगने के साथ ही मल्लार गाया जाने लगा है। अब महफिलों से लेकर संगीत की बैठकों तक घटाओं के विविध रूप और वर्षा की अनेक प्रकृति का वर्णन अब मल्हार की बंदिशों में यादगार बनेगा।