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गंगा में धोए जा रहे कपड़े और जानवर, जिम्मेदार और घाट के बाशिंदों का रवैया दुखद

Fri, 23 Feb 2018 10:43 AM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला,वाराणसी
न्यूज डेस्क, अमर उजाला,वाराणसी Updated Fri, 23 Feb 2018 10:43 AM IST
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clothes amd animals were washing in ganga people silent
खिड़किया घाट, रानी घाट से गायघाट और भैंसासुर घाट पर धड़ल्ले से बिगाड़ रहे गंगा का स्वरूप - फोटो : अमर उजाला
काशी के जिन घाटों से विश्व के लोगों की आस्था जुड़ी है, उन घाटों पर जीवनदायी गंगा को मैला करने वाले जरा भी संकोच नहीं कर रहे। वे गंदे कपड़े और जानवरों को गंगा में खुलेआम धो रहे हैं। रानी घाट से लेकर निषाद घाट तक कपड़ा धुलने वालों की भरमार है। घाट पर कपड़ों का अंबार देखकर लगता है कि पूरे शहर के कपड़े यहीं धोए जाते हैं।
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घरों की गंदगी और कूड़ा भी लोग गंगा में फेंकने से परहेज नहीं करते हैं। शिव की नगरी में मां गंगा के घाट छोड़ने और प्रदूषण के भयावह स्तर पर पहुंचने के बाद भी घाट के किनारे रहने वाले इस ओर ध्यान ही नहीं दे रहे। 
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शहर के सीवेज, नालों और गंदगी से गंगा में प्रदूषण का स्तर लगातार बढ़ता ही जा रहा है। गंदगी की बात करें तो खिड़किया घाट के बाद रानी घाट से गायघाट के बीच सफाई की स्थिति भी बेहद खराब है। भैंसासुर घाट के पहले गंगा में पशुपालक अपनी भैंसों को नहाने के लिए छोड़ देते हैं। भैंसें गंगा में ही मलमूत्र त्याग करती हैं। 
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जैसे ही रानी घाट से आगे बढ़ते हैं तो काफी संख्या में लोग गंगा के पानी में ही कपड़े धुलते हुए नजर आते हैं। कपड़ों का अंबार यह बताने के लिए काफी है कि पूरे शहर के कपड़े गंगा घाट पर ही धोए जा रहे हैं। जिम्मेदार अधिकारियों की तो इस ओर नजर ही नहीं जा रही।

घाट किनारे रहने वाले भी इसे लेकर खास चिंतित नहीं दिख रहे। गंगा के इस हाल के लिए सरकारी उदासीनता के साथ ही उसे गंदा करने वालों और मौन रहकर गंदा होते देखते रहने वालों का रवैया जिम्मेदार है।

गंगा में कपड़े धुलने से रोकने के लिए नगर निगम ने जायका के तहत जगह-जगह धोबी घाट बनाए। करोड़ों रुपये खर्च किए गए मगर यह सब नाकाफी है। अब भी धड़ल्ले से कपड़े धुलने का क्रम बदस्तूर जारी है।

कोनिया, पांडेयपुर, भवनिया पोखरी और नदेसर में धोबीघाट बनाए गए हैं। इसके अलावा तीन और धोबीघाट बनकर तैयार हैं। हालांकि अभी इसे चालू नहीं किया गया है। 

शुरू होने के साथ समाप्त हुईं योजनाएं

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गंगा भले मैली हो जाए, कपड़े सफेद रहने चाहिए - फोटो : अमर उजाला

वाराणसी नगर निगम द्वारा गंगा स्वच्छता के लिए कई योजनाएं बनाई गईं लेकिन प्रशासनिक उदासीनता के कारण ये योजनाएं शुरू होने के साथ ही खत्म हो गईं। गंगा को स्वच्छ और लोगों में जागरूकता फैलाने के उद्देश्य से नगर निगम ने विशेष अभियान की शुरुआत की थी।

इसके तहत गंगा में साबुन लगाकर नहाने और कपड़ा धुलने वालों पर ज़ुर्माना लगाया जा रहा था। शीतला घाट के मनोज शर्मा ने बताया कि प्रशासन ने शुरू में सख्ती दिखाई तो घाट पर कपड़े धुलने का काम बंद हो गया था लेकिन अब यह फिर से शुरू हो गया है।

राजमंदिर मोहल्ले के रहने वाले पंकज ने बताया कि साबुन लगाकर नहाने वालों को मना किया जाता है तो वह मानते नहीं हैं। तीर्थ पुरोहित श्याम नारायण पांडेय ने बताया कि सामने घाट से आदिकेशवघाट तक क छुआ सेंचुरी घोषित है जिसके चलते सात किमी की दूरी में बालू खनन पर रोक लगी है।

इसके चलते बालू क्षेत्र में लगातार विस्तार होता जा रहा है। वह भी घाटों की ओर। ऐसे में एक तो पहले ही गंगा में जल की कमी के कारण प्रवाह का वेग कम हो गया है दूसरे रेत काफी मात्रा में जल अवशोषित कर रही है।

32 साल में तिगुनी हुई आबादी, नहीं बढ़े ट्रीटमेंट प्लांट

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चौबीसों घंटे नालों से गिरते मल-जल से हालात भयावह - फोटो : अमर उजाला
गंगा की निर्मलता और अविरलता के लिए 1986 में गंगा एक्शन प्लान की शुरुआत की गई थी। उस वक्त शहर में तीन सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट शुरू किए गए थे। दीनापुर, भगवानपुर और डीएलडब्लयू में। पिछले 32 साल में आबादी तीन गुना बढ़ गई है, लेकिन ट्रीटमेंट प्लांट की संख्या तीन ही है। बावजूद इसके सरकार का ये दावा करना कि गंगा प्रदूषण कम हो गया है, समझ के परे है। 

पर्यावरणविद प्रो. बीडी त्रिपाठी ने बताया कि आज गंगा प्रदूषण एक अनुमानित आंकड़े के अनुसार मणिकर्णिका घाट और हरिश्चंद्र घाट पर एक साल में 33000 शव जलाए जाते हैं। इसमें 16 हजार टन लकडि़यां जलाई जा रही हैं जो कि गंगा प्रदूषण का बहुत बड़ा कारण बन रही है।

इससे 300 टन राख गंगा में बहाए जा रहे हैं। 250 टन अधजले शव गंगा में प्रवाहित किए जा रहे हैं। तीन हजार बच्चों और बुजुर्गों के शव और 6000 मरे हुए जानवर गंगा में प्रवाहित किए जा रहे हैं।

बावजूद इसके आज गंगा प्रदूषण से ज्यादा गंगा का जलस्तर का घटना खतरनाक है। जिस तरह से गंगा का जल स्तर घट रहा है वो बेहद चिंताजनक है। इससे पर्यावरण असंतुलन की समस्या उत्पन्न होगी। साथ ही धार्मिक भावनाएं भी आहत होंगी। 
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