यूपी: कैंसर हुआ तो घर से निकाला, मौत पर शव लेने नहीं आए अपने; अब 10 लाख के बीमा के लिए पिता को याद आया बेटा
वाराणसी में 70 मामले ऐसे मामले हैं, जिसमें कैंसर हुआ तो परिजनों ने घर से निकाल दिया। वहीं 49 की मौत के बाद उनके अपने लोग शव लेने भी नहीं आए। वहीं एक पिता को बेटे की मौत के बाद याद आया। इसका कारण था 10 लाख रुपये का बीमा।
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काशी के अपना घर आश्रम में कैंसर के 70 ऐसे मरीज पहुंचे हैं जिनके अपनों ने उन्हें इस बीमारी की वजह से घर से निकाल दिया। इनमें 49 लोग तो ऐसे हैं जिनके परिजन मौत के बाद शव लेने तक नहीं आए। 12 मरीजों का अपना घर आश्रम अपने खर्च पर इलाज करवा रहा है।
काशी के आश्रम में पिछले 8 साल में 70 कैंसर पीड़ित पहुंचे हैं। 2018 से अब तक 49 पीड़ितों की मौत हो चुकी। आश्रम प्रबंधन अलग-अलग संस्थानों की मदद से यहां आने वालों का इलाज करवाता है। नौ का इलाज अभी चल रहा है। इनमें से पांच महिलाएं ऐसी हैं जिन्हें गर्भाशय का कैंसर है। दो महिलाओं में ब्रेस्ट कैंसर की पुष्टि हुई है। एक महिला का चार दिनों पहले एक निजी अस्पताल में डॉ. विनोद गुप्ता ने ऑपरेशन किया है।
केस -1: 10 लाख रुपये बीमा के लिए पिता को याद आया बेटा
रामनगर का 35 वर्षीय दिव्यांग युवक छह महीने से आश्रम में रह रहा था। बेटे के गंभीर रूप से बीमार रहने पर भी पिता उसे लेने नहीं आया। कैंसर से उसकी मौत के बाद शव लेने नहीं पहुंचे। बाद में शव को कानूनी रूप से आईएमएस बीएचयू में डोनेट कर दिया गया। पिता को बाद में मालूम चला कि उनके बेटे ने अपने नाम से 10 लाख रुपये का बीमा करा रखा था। अब वह मृत्यु प्रमाण पत्र के लिए आश्रम और सरकारी विभागों के चक्कर लगा रहे हैं।
मानसिक रूप से विक्षिप्त एक महिला को आठ महीने पहले रोहनिया क्षेत्र से रेस्क्यू किया गया था। जांच के दौरान कैंसर की पुष्टि हुई। आश्रम अपने खर्च पर महिला का इलाज करा रहा है। उसके सही पते की जानकारी अभी तक नहीं हो सकी।
पिपलानी कटरा के एक मुस्लिम परिवार की महिला को गर्भाशय का कैंसर था। आश्रम में उनका एक साल तक इलाज चला। इसमें करीब 2.5 लाख रुपये खर्च हो गए। परिजनों से कई बार संपर्क करने की कोशिश की गई, लेकिन उनकी ओर से जवाब नहीं मिला। एक साल के बाद महिला एक की मौत हो गई। उसके शव को आईएमएस बीएचयू को दान किया गया।
45 वर्षीय एक व्यक्ति को अमाशय का कैंसर था। चिकित्सकों की जांच में सामने आया कि उन्होंने कभी एसिड पी लिया होगा या जबरन पिलाया होगा। जिसके कारण नसें चिपक गई थीं। छह महीने आश्रम में रखकर इलाज किया गया। ऑपरेशन भी हुआ, लेकिन वह ठीक नहीं हुए। बाद में मौत हो गई।
आश्रम के संचालक डॉ. के निरंजन के मुताबिक, इन मरीजों के इलाज में सबसे ज्यादा समस्या आती है। इनका आधार कार्ड और पहचान न होने के कारण इनका अस्पतालों में रजिस्ट्रेशन ही नहीं हो पाता है। सरकारी अस्पतालों में न तो इलाज मिल पाता है और न ही कोई सुविधा। आश्रम के कुछ सहयोगी जैसे रोटरी क्लब, सामाजिक संस्थाएं और समाजसेवियों के सहयोग से इनका इलाज कराया जाता है।