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बनारसवाले बस आदत बदल लें तो सब ठीक हो जाए

Tue, 24 Nov 2015 02:04 AM IST
ब्यूरो, अमर उजाला वाराणसी
ब्यूरो, अमर उजाला वाराणसी Updated Tue, 24 Nov 2015 02:04 AM IST
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Bnaraswale just so good to be used to change
चौक-ठठेरी बाजार की गलियों में बचपन बिताने वाले समीर फिल्म इंडस्ट्री को अपने गीतों से महकाने के लिए भले मुंबई चले गए हों, लेकिन बनारस उनकी धड़कनों का हिस्सा है। चौखंभा की संकरी गलियों की मिठाइयां, चबूतरों की बतकही और राह चलते सुनी जाने वाली तबले की थापों के साथ सुरों के सा रे ग म... वाला जीवन उन्हें कहीं नहीं दिखाई देता। महज पांच साल की उम्र की जिंदगी का वो दौर उन्हें अच्छी तरह याद है जब चौक के पास सीएन डे के मकान में वह रहते थे।
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 उन दिनों आसपास की गलियों के कोठों से बाइयों की गूंजने वाली तान सुनकर अटारियों की ओर झांकने पर पिताजी (मशहूर गीतकार अंजान) डांटने लगते थे- खबरदार...़ पढ़ाई में मन लगाओ..। विकास के चर्चे शुरू होते ही समीर पुरानी यादों में खो जाते हैं। वह कहते हैं कि चार दशक में बनारस का पुराना जीवन बहुत बदल चुका है, अब इसे बदलने की नहीं, बचाने की जरूरत है।
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समीर कहते हैं कि काशी में शांति की मान्यता ही नहीं, इसका विज्ञान भी है। विश्व भर में बनारस जैसी सुबह कहीं नहीं मिलती। मंदिरों से घंटों की गूंज और वेद ऋचाओं के गान के साथ होने वाले सूर्योदय का कोई सीढ़ियों पर, कोई मढ़ियों पर तो कोई नावों पर इंतजार करता है। उस सुबह का सुख लेने के लिए कहां से लोग नहीं आते? विकास के नाम पर पुराने बनारस में किसी तरह की तोड़फोड़ गलत कदम होगा।
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बदलाव के लिए पुरानी चीजों को तोड़ा जाएगा तो बनारस खत्म हो जाएगा। समीर कहते हैं कि यहां का साहित्यिक, सांस्कृतिक माहौल, पावनता, बाबा विश्वनाथ और गंगा के प्रति लोगों की आस्था उन्हें यहां खींचकर लाती है। इनको इनके स्वरूप में परिवर्तन किए बिना आधुनिकीकरण की योजनाएं बनाई जानी चाहिए। लेकिन बुनियाद न हिलाई जाए। बनारस का जो बाहरी हिस्सा है उसे जितना नवीनतम स्वरूप दे सकते हैं वह अच्छा होगा। मस्ती के इस शहर की संगीत-कला को लेकर समीर की चिंता भी बढ़ती जा रही है। संगीत-कला के संरक्षण और प्रचार के लिए सहूलियतें नहीं हैं। यही वजह है कि बिस्मिल्लाह खां के बाद लग रहा है कि शहनाई खत्म हो गई।

दुनिया में सितार के सरताज के रूप में मशहूर रहे पं. रविशंकर भी काशी में संगीत के लिए कुछ नहीं कर सके। गिरिजा देवी के मन की भी कसक इसे लेकर जब तब सामने आती रहती है। इस शहर में एक संगीत एकेडमी होनी चाहिए। इसके लिए प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री से वो मिलना चाहते हैं। उन्हें उम्मीद है कि आने वाले दिनों में कुछ होगा जरूर।


फिर वह कुमार दुष्यंत का शेर पढ़ते हैं- सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं/मेरी कोशिश है कि ए सूरत बदलनी चाहिए...। समीर कहते हैं कि स्वच्छ काशी-सुंदर काशी का सपना तब साकार होगा, जब बनारसवाले अपनी आदत बदलेंगे। वह बताते कि ठेलों पर डस्टबीन रखे हुए हैं फिर भी तमाम लोग चाट खाने के बाद दोना सड़की पटरियों पर ही फेंकने के आदी नजर आते हैं। यही हाल रहा तो तमाम योजनाएं और विकास के नए पन्ने खोलने से कोई फायदा नहीं होगा। बनारस और गंगा पर गीत लिखने का समीर का बहुत मन हैं लेकिन अभी किसी फिल्म में मौका नहीं मिल सका। वह अवसर जब भी आएगा वह अपने गीतों में बनारस के मिजाज को पिरो कर दिखा देंगे।
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