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महामना के आदर्शों से आगे बढ़ते रहने की मिली प्रेरणा
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वाराणसी। महामना की बगिया ऐसी बगिया है, जहां से पढ़कर निकले छात्र देश के लगभग सभी क्षेत्रों में मिल जाएंगे। तकनीकी विशेषज्ञों के साथ ही चिकित्सा जगत, वैज्ञानिक, खेलकूद, प्रशासनिक और राजनीतिक क्षेत्र में भी यहां के छात्र-छात्रा उच्च शिखर पर काबिज है। कोई यहां से पढ़ाई करने के बाद यहीं शिक्षक हुआ तो कोई चिकित्सक बनकर मरीजों की सेवा कर रहा है। यहां के छात्र रहे कई लोग अभी भी यहीं अलग-अलग विभागों में सेवा दे रहे हैं। बीएचयू में 17-18 जनवरी को होने वाले अंतरराष्ट्रीय समागम में देश-विदेश में रहने वाले ऐसे सभी छात्र और शिक्षक एक जगह मिलेंगे। ऐसे ही आईएमएस बीएचयू नेत्र रोग विभाग के पूर्व अध्यक्ष और क्षेत्रीय नेत्र संस्थान के निदेशक प्रो.एमके सिंह और चीफ प्रॉक्टर ओपी राय का कहना है कि इस विश्वविद्यालय के मुकाबले देश का कोई संस्थान नहीं है। छात्र जीवन हो या शिक्षक जीवन। हमेशा महामना के आदर्शों के साथ ही आगे बढ़ते रहने की प्रेरणा मिलती रहती है।
बीएचयू का कोई विकल्प नहीं
विश्वविद्यालय तो देश दुनिया में बहुत हैं लेकिन बीएचयू की जो परंपराएं और आदर्श हैं, उसके आगे कोई विश्वविद्यालय नहीं टिकता है। महामना मालवीय की प्रेरणा के बल पर ही आगे बढ़ते रहने का हौसला मिलता है। शिक्षक के रुप में सेवा शुरू की, इसके बाद यहीं से शोध भी पूरा किया। गुरु-शिष्य के बीच जो प्रेम भाव यहां दिखता है वह अनोखा है। उसकी तुलना अन्य जगह से करना बड़ा कठिन है। जहां तक इसके कैंपस का सवाल है तो अभी यहां का और बरकच्छा का कैंपस मिलाकर 4000 एकड़ हो जाता है।समय के साथ गिरावट आई है। पहले जितनी सतर्कता थी वो अब नही दिखती है।-प्रो. ओपी राय, चीफ प्रॉक्टर
एक कैंपस जहां मिलती है हर जानकारी
बीएचयू ही एक ऐसा कैंपस हैं, जहां एक ही कैंपस में स्कूलिंग से लेकर उच्च शिक्षा तक के अध्ययन की सुविधा है। यहां जो परिवेश मिलता है। शायद ही कहीं देखने को मिलता है। एक छात्र अगर मेडिकल में दाखिला लिया तो वह अपने विभाग के अलावा अन्य किसी के बारे में नहीं जान पाता है। एक कैंपस में तकनीकी संस्थान, चिकित्सा के साथ ही सामान्य विषयों की जानकारी भी मिलती है। बात 1980 की है जब मैं बीएचयू में एमबीबीएस के छात्र के रुप में दाखिला लिया था। इसके बाद एमएस करने के बाद अब मरीजों की सेवा का अवसर भी इसी विश्वविद्यालय ने ही दिया। यहां गुरु-शिष्य परंपरा की एक अलग मिसाल देखने को मिलती है। इसको बरकरार रखना हम सभी की जिम्मेदारी है।-प्रो.एमके सिंह, निदेशक, क्षेत्रीय नेत्र संस्थान
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बीएचयू का कोई विकल्प नहीं
विश्वविद्यालय तो देश दुनिया में बहुत हैं लेकिन बीएचयू की जो परंपराएं और आदर्श हैं, उसके आगे कोई विश्वविद्यालय नहीं टिकता है। महामना मालवीय की प्रेरणा के बल पर ही आगे बढ़ते रहने का हौसला मिलता है। शिक्षक के रुप में सेवा शुरू की, इसके बाद यहीं से शोध भी पूरा किया। गुरु-शिष्य के बीच जो प्रेम भाव यहां दिखता है वह अनोखा है। उसकी तुलना अन्य जगह से करना बड़ा कठिन है। जहां तक इसके कैंपस का सवाल है तो अभी यहां का और बरकच्छा का कैंपस मिलाकर 4000 एकड़ हो जाता है।समय के साथ गिरावट आई है। पहले जितनी सतर्कता थी वो अब नही दिखती है।-प्रो. ओपी राय, चीफ प्रॉक्टर
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एक कैंपस जहां मिलती है हर जानकारी
बीएचयू ही एक ऐसा कैंपस हैं, जहां एक ही कैंपस में स्कूलिंग से लेकर उच्च शिक्षा तक के अध्ययन की सुविधा है। यहां जो परिवेश मिलता है। शायद ही कहीं देखने को मिलता है। एक छात्र अगर मेडिकल में दाखिला लिया तो वह अपने विभाग के अलावा अन्य किसी के बारे में नहीं जान पाता है। एक कैंपस में तकनीकी संस्थान, चिकित्सा के साथ ही सामान्य विषयों की जानकारी भी मिलती है। बात 1980 की है जब मैं बीएचयू में एमबीबीएस के छात्र के रुप में दाखिला लिया था। इसके बाद एमएस करने के बाद अब मरीजों की सेवा का अवसर भी इसी विश्वविद्यालय ने ही दिया। यहां गुरु-शिष्य परंपरा की एक अलग मिसाल देखने को मिलती है। इसको बरकरार रखना हम सभी की जिम्मेदारी है।-प्रो.एमके सिंह, निदेशक, क्षेत्रीय नेत्र संस्थान
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