बीएचयू समेत पांच संस्थानों का शोध: हिमालय की वादियों में घट रहे मेंढक, जेनेटिक विविधता भी हो रही कम
बीएचयू-कलकत्ता समेत पांच संस्थानों ने मेंढक पर शोध किया। दार्जिलिंग में सिर्फ 60 मेंढक मिले। शोध के दौरान 57 जगहों से नमूने लिए गए। 200 मीटर से 2400 मीटर ऊंचाई तक के झरनों और तेज धाराओं और चट्टानी नालों में सर्वे हुआ।
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हिमालय में पाए जाने वाले मेंढकों की आबादी घट रही है। उनकी आनुवंशिक विविधता भी कम हो रही है। इसका असर इनकी बदलते पर्यावरण, बीमारियों और जलवायु परिवर्तन से लड़ने की क्षमता पर पड़ सकता है। बीएचयू, कलकत्ता विश्वविद्यालय समेत देश के पांच संस्थानों के वैज्ञानिकों के शोध में यह बात सामने आई है।
शोध में सबसे चिंताजनक स्थिति जैव विविधता के हॉटस्पॉट माने जाने वाले दार्जिलिंग और कलिम्पोंग क्षेत्र में मिली। वैज्ञानिकों को यहां एक झरने के पास सर्वे के दौरान सिर्फ 60 मेंढक मिले। इनमें से 35 के डीएनए का अध्ययन किया गया। शोध दल ने दार्जिलिंग के पहाड़ी क्षेत्र में 57 स्थानों से नमूने लिए। 200 मीटर से 2400 मीटर तक की ऊंचाई वाले झरनों, तेज धाराओं और चट्टानी नालों में सर्वे किया गया। 12 वैज्ञानिकों का यह शोध अंतरराष्ट्रीय जर्नल बीएमसी जेनेटिक्स में प्रकाशित हुआ है।
शोध के अनुसार दार्जिलिंग में मेंढकों की कम आनुवंशिक विविधता की एक बड़ी वजह भौगोलिक अलगाव और सीमित जीन प्रवाह है। इसके अलावा स्थानीय स्तर पर मेंढक पकड़ने और खाने की परंपरा का भी इनकी आबादी पर दबाव है। बरसात के मौसम में रात के समय चट्टानों और झाड़ियों पर बैठे मेंढकों को पकड़ना आम है।
दार्जिलिंग के स्थानीय लोग इन मेंढकों को ‘सिसने पाहा’ या ‘सिसने पा’ कहते हैं। स्थानीय स्तर पर इन्हें भोजन और पारंपरिक उपचार के लिए भी पकड़ा जाता रहा है। शोध में पाया गया कि दार्जिलिंग की इस प्रजाति की आबादी एशिया के दूसरे क्षेत्रों की तुलना में आनुवंशिक रूप से कमजोर और अलग-थलग है।
वैज्ञानिकों ने मेंढकों के 16 एस आरआरएनए और सीओआई नामक दो मानक जीन का विस्तृत अध्ययन किया। इसके बाद दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में उपलब्ध डीएनए सीक्वेंस से इनकी तुलना की गई। इसमें दार्जिलिंग की आबादी में डीएनए की विविधता सबसे कम मिली। जबकि म्यांमार, दक्षिण-पूर्व एशिया और चीन की आबादी में आनुवंशिक विविधता ज्यादा पाई गई। इससे संकेत मिला कि दार्जिलिंग के मेंढकों का समूह लंबे समय से दूसरे क्षेत्रों की आबादी से काफी हद तक अलग रहा है।
करोड़ों साल पहले अलग हुई शाखा
शोध के प्रथम लेखक कुमरेश मंडल ने बताया कि दार्जिलिंग की वर्तमान आबादी की शुरुआत इतिहास में एक छोटे समूह से हुई होगी। इसे वैज्ञानिक भाषा में फाउंडर इफेक्ट कहा जाता है। इसके बाद यह आबादी तेजी से फैली। शोध के मुताबिक एशिया में इस प्रजाति का साझा पूर्वज करीब 1.74 करोड़ वर्ष पहले मौजूद था। दक्षिण एशियाई यानी दार्जिलिंग की शाखा करीब 1.12 करोड़ वर्ष पहले अलग हुई, जबकि वर्तमान दार्जिलिंग वंश करीब 9.4 लाख वर्ष पहले विकसित हुआ।
कलकत्ता विश्वविद्यालय के डॉ. राकेश तामांग ने कहा कि दार्जिलिंग के मेंढकों की आबादी आनुवंशिक रूप से अलग और कम विविधता वाली है। संरक्षण नीति बनाते समय इसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
बीएचयू के जीन विज्ञानी प्रो. ज्ञानेश्वर चौबे का कहना है कि पूर्वी हिमालय के मेंढकों में आनुवंशिक विविधता पश्चिमी घाट की तुलना में कम है। कम आनुवंशिक विविधता वाली आबादी जलवायु परिवर्तन और बीमारियों के प्रति ज्यादा संवेदनशील हो सकती है। स्थानीय लोगों को जागरूक किए बिना इनका संरक्षण संभव नहीं होगा।