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पुण्यतिथि आजः दिलो-दिमाग में आज भी लयबद्ध हैं उस्ताद बिस्मिल्ला खां की शहनाई की धुनें
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, वाराणसी
Updated Tue, 21 Aug 2018 11:30 AM IST
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बिस्मिल्लाह खां
- फोटो : file photo
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सांसों की माला जस-जस शहनाई में घुलती, त्यों-त्यों रूहानी धुन साज बनकर निकलती। फिर क्या, हर कोई कायल हो जाता। जी हां, बात उस्ताद बिस्मिलाह खां की हो रही है। उन्होंने तालाब की नरकट को ऐसा तराशा कि उसकी आवाज की देश-दुनिया कायल हो गई।
काशी कलात्मकता का रंगमंच है तो भारत रत्न ‘उस्ताद’ उसके सबसे अजीम किरदार हैं। उन्होंने शहनाई की धुन से ऐसा हुनर गढ़ा जो कला के कद्रदानों के दिलों में आज भी लयबद्ध है।
21 अगस्त 2006...। इस महान फनकार ने आज के दिन ही इस दुनिया से रुखसत ली थी। शहनाई से उनके इश्क की दास्तां देखिए कि काशी की सांस्कृतिक विरासत के इस पुरोधा की कब्र में शहनाई भी दफनाई गई।
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21 मार्च 1916 को बिहार में जन्मे कमरुद्दीन इस सांस्कृतिक नगरी काशी आकर बिस्मिल्ला खां बने और अपनी हुनर की बदौलत यहीं अपने नाम के आगे ‘उस्ताद’ कमाया। कहते हैं दादा ने जब बच्चे का चेहरा देखा तो उनके मुंह से निकला था बिस्मिल्ला...।
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काशी कलात्मकता का रंगमंच है तो भारत रत्न ‘उस्ताद’ उसके सबसे अजीम किरदार हैं। उन्होंने शहनाई की धुन से ऐसा हुनर गढ़ा जो कला के कद्रदानों के दिलों में आज भी लयबद्ध है।
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21 अगस्त 2006...। इस महान फनकार ने आज के दिन ही इस दुनिया से रुखसत ली थी। शहनाई से उनके इश्क की दास्तां देखिए कि काशी की सांस्कृतिक विरासत के इस पुरोधा की कब्र में शहनाई भी दफनाई गई।
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21 मार्च 1916 को बिहार में जन्मे कमरुद्दीन इस सांस्कृतिक नगरी काशी आकर बिस्मिल्ला खां बने और अपनी हुनर की बदौलत यहीं अपने नाम के आगे ‘उस्ताद’ कमाया। कहते हैं दादा ने जब बच्चे का चेहरा देखा तो उनके मुंह से निकला था बिस्मिल्ला...।
बनारस बनी कर्मस्थली
डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम भी थे उस्ताद के मुरीद
- फोटो : file photo
बनारस में उनकी नानी का घर था और यहीं बाद में उनकी कर्मस्थली बनी। उन्होंने मामा के साथ शहनाई बजाने की शुरुआत की। ज्यों-ज्यों दिन बीते उनकी फनकारी जवां होती गई। काशी के इस रत्न को तराशने का काम शुरू हो गया।
फिर क्या, उस्ताद ने शहनाई जैसे साधारण वाद्य यंत्र को तालाब की तलहटी से उठाकर संगीत के शिखर पर पहुंचा दिया। वह शहनाई बजाने को इबादत मानते थे। काशी के घाटों पर और मंदिरों के सामने शहनाई बजाते, लोग सुनकर मंत्रमुग्ध हो जाते।
उनके कद्रदानों में पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी, राजीव गांधी से लेकर फिल्म अभिनेता तक शामिल थे। उस्ताद बिस्मिल्ला खां ने कई फिल्मों में शहनाई का सुर घोला। यही नहीं जब देश आजाद हुआ तो उस्ताद की शहनाई की धुनों से ही आजादी की भोर हुई थी।
पंडित जवाहर लाल नेहरू के बुलावे पर 15 अगस्त 1947 को लाल किले पर झंडा फहराने के बाद उस्ताद ने ‘रघुपति राघव राजा राम...’ की धुन बजाई थी। उस्ताद की आत्मा तो काशी और गंगा में बसती थी। यही वजह थी कि कई बार मुंबई जाने का, वहां बस जाने का मौका मिला लेकिन वो राजी नहीं हुए और इसी मिट्टी से रुखसती ली।
फिर क्या, उस्ताद ने शहनाई जैसे साधारण वाद्य यंत्र को तालाब की तलहटी से उठाकर संगीत के शिखर पर पहुंचा दिया। वह शहनाई बजाने को इबादत मानते थे। काशी के घाटों पर और मंदिरों के सामने शहनाई बजाते, लोग सुनकर मंत्रमुग्ध हो जाते।
उनके कद्रदानों में पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी, राजीव गांधी से लेकर फिल्म अभिनेता तक शामिल थे। उस्ताद बिस्मिल्ला खां ने कई फिल्मों में शहनाई का सुर घोला। यही नहीं जब देश आजाद हुआ तो उस्ताद की शहनाई की धुनों से ही आजादी की भोर हुई थी।
पंडित जवाहर लाल नेहरू के बुलावे पर 15 अगस्त 1947 को लाल किले पर झंडा फहराने के बाद उस्ताद ने ‘रघुपति राघव राजा राम...’ की धुन बजाई थी। उस्ताद की आत्मा तो काशी और गंगा में बसती थी। यही वजह थी कि कई बार मुंबई जाने का, वहां बस जाने का मौका मिला लेकिन वो राजी नहीं हुए और इसी मिट्टी से रुखसती ली।