अगस्त क्रांति: ...जब 50 फीट ऊंचे लाल भवन पर फहराया तिरंगा, नौ अगस्त को काशी की जनता उतर आई थी सड़क पर
Varanasi News: काशी से अगस्त क्रांति के खास यादें जुड़ी हुई हैं। देश की स्वतंत्रता में इस जिले का अहम योगदान रहा है। आठ अगस्त 1942 को अंग्रजों भारत छोड़ों की घोषणा होते ही काशी की गलियां युवाओं से भर गईं। हर तरफ भारत माता की जय-जय कार होने लगी।
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नौ अगस्त रविवार का दिन। अल सुबह गली-मोहल्लों से लोग अंग्रेजों भारत छोड़ो का नारा लगाते वंदेमातरम का उद्घोष करते हुए निकल पड़े। शहर भर से जुलूस निकल रहे थे। विश्वेश्वरगंज, मैदागिन, टाउनहाल, चेतगंज, मैदागिन समेत हर तरफ जनता सड़क पर थी। पुलिस के हाथ-पांव फूल गये। घबराए अफसरों ने लाठीचार्ज का आदेश दे दिया। पुलिस को जैसे आदेश का ही इंतजार था और जनता पर टूट पड़ी।
बनारस के इतिहास और क्रांतिकारियों पर शोध कर रहे बनारस बार के पूर्व महामंत्री नित्यानंद राय ने बताया कि आठ अगस्त 1942 को भारत छोड़ो आंदोलन की घोषणा होते ही काशी में कांग्रेस दफ्तर सील कर दिया गया।
लड़ाई के पहले ही दिन नौ अगस्त को छात्र-छात्राओं का एक बड़ा जुलूस प्रो. गैरोला के नेतृत्व में बीएचयू से निकला। उसके बाद प्रो. गैरोला अंडरग्राउंड हो गए। ठठेरी बाजार में भारतेंदु हरिश्चंद्र के घर से सटा मकान बंगाली ड्योढ़ी संघर्ष का कार्यालय बन गया।
10 अगस्त को छात्रों ने शहर में प्रवेश किया और विशाल जुलूस के साथ कलेक्ट्रेट पर तिरंगा फहरा दिया पर सिविल कोर्ट का विशाल लाल भवन आड़े आ रहा था। भीड़ में से अचानक निकले एक दुबले पतले लड़के ने असंभव काम को संभव कर दिया और पचास फीट ऊंचे लाल भवन पर तिरंगा फहरा दिया।
लोग खुशी से झूम उठे, भारत माता की जय, वंदे मातरम के गगनभेदी नारे लगने लगे। फिर क्या था पहली बार कचहरी पर यूनियन जैक की जगह तिरंगा शान से लहरा रहा था। ब्रितानिया हुकूमत के सिपाहियों ने लाठी चार्ज कर दिया। काफी छात्र घायल हो गए, छात्रों ने भी टेलीफोन और टेलीग्राफ के पोल गिरा दिए गए।
पांच जगहों पर हुई फायरिंग
बनारस में अगस्त क्रांति की मशाल काशी हिंदू विश्वविद्यालय के छात्रों ने जलाई हुई थी। छात्र ही गार्ड थे और छात्र ही पुलिस। पुलिस के सामने कचहरी के लाल भवन व कलेक्ट्रेट पर तिरंगा फहरा देने से छात्रों के हौसले बुलंद थे।
12 अगस्त को छात्रों के गदर को दबाने के लिए पांच जगहों पर फायरिंग हुई। भारत छोड़ो आंदोलन में महिलाएं और कॉलेज की छात्राएं भी पीछे नहीं रहीं। 10 अगस्त को बीएचयू के छात्राओं के एक दल ने कांग्रेस कार्यालय पर हल्ला बोल दिया और पुलिस के कब्जे से छुड़ाकर कब्जा जमा लिया।
ट्रेन के इंजन पर तिरंगा फहराया
14 अगस्त को छात्रों ने लोकल पैसेंजर ट्रेन पर कब्जा जमा लिया और इंजन पर तिरंगा फहराकर उसे बलिया तक ले गए। ज्यों-ज्यों आंदोलन तेज होता गया टेलीफोन और टेलीग्राफ के तार गिरा दिए गए। रेलवे की पटरियां उखाड़ दी गईं।
रेलवे स्टेशन तहस-नहस कर दिए गए। रेलवे स्टेशन, पोस्ट ऑफिस आग के हवाले कर दिए। इलाहाबाद-बनारस-गया-पटना रेलवे लाइन ध्वस्त हो गई। पोस्ट ऑफिस जला दिए गए। जीटी रोड खोद दी गई। बाबतपुर और रजवारी एरोड्रम को भी काफी नुकसान पहुंचा।
मालवीयजी और डाॅ. राधाकृष्णन को किया घर में कैद
आंदोलन को दबाने के लिए ब्रितानिया हुकूमत ने जुल्म की इंतेहा कर दी। एक शक्तिशाली फौज बीएचयू पहुंची और छात्रों से हाॅस्टल खाली करा लिया गया। छात्रों की जमकर पिटाई हुई। उन्हें खींच-खींचकर हाॅस्टल से निकाला गया।
मालवीयजी और डाॅ. राधाकृष्णन के निवास को फौज ने घेर लिया और उन दोनों को घर में ही नजरबंद कर दिया गया। 16 अगस्त को पुलिस ने मुगलसराय और बनारस के बीच एक जगह फायरिंग की जिसमें पांच लोग मारे गए बहुतेरे घायल हुए। शहर में दो नाबालिग बच्चों को गोली मार दी गई।