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जब तक समानता सिर्फ स्वप्न है, पूरा भारत मुर्दहिया है

Thu, 01 Jul 2021 12:45 AM IST
Varanasi Bureau वाराणसी ब्यूरो
Updated Thu, 01 Jul 2021 12:45 AM IST
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As long as equality is only a dream, the whole of India is a corpse
अपमान से कुंठित होने के बजाय पानी की तरह चलते जाने का जज्बा डॉ. तुलसीराम ने दिखाया। इसी बात ने उन्हें बहुतों के दिलों में अपनी खास जगह दे दी। दलित आत्मकथाएं बहुत लिखीं गई हैं, लेकिन उनमें से ज्यादातर छुआछूत और उत्पीड़न की सिर्फ शिकायत करती हैं। तुलसीराम ने दिखाया कि दलित सिर्फ बिसूरते नहीं हैं, उनकी भी आत्मसम्मान की रक्षा के लिए लड़ने की परंपरा है, अपने हथियार हैं। तुलसीराम ने अपनी जड़ों को जिस सरलता से याद किया और अपनी पक्षधरता को बेधड़क लिखा वह दुर्लभ है।
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साहित्यकार डॉ. इंदीवर पांडेय ने बताया कि डॉ. तुलसीराम बीएचयू में उनके जूनियर थे। तुलसीराम ने दुनिया को तो अलविदा कह दिया है, लेकिन साहित्य और अकादमिक जगत उन्हें कभी अलविदा नहीं कहेगा। जब तक समानता सिर्फ स्वप्न है पूरा भारत मुर्दहिया है, जिसमें तुलसीराम की धातु की झंकार जब भी कोई कोशिश करेगा सुनाई देगी। घनघोर प्रताड़ना के बावजूद उन्होंने आत्मकथा में उन सदाशय सवर्णों को भी याद रखा, जिन्होंने एक वक्त खाना खिलाया, फीस भरी या चुपचाप चलते रहने का हौसला दिया। वह नामवर सिंह के बेहद करीबी थे।
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तुलसीराम ने आगे की पढ़ाई के लिए पहले गांव छोड़ा और आजमगढ़ पहुंचे और इसके बाद बीएचयू। घर से बीएचयू तक का सफर तय करने में उन्हें कई कई दिनों तक भूखे रहना पड़ा और भयंकर अभावों से गुजरना पड़ा और सामाजिक अपमान का दंश झेलना पड़ा। वह भोजन बहुत अच्छा बनाते थे और खिलाने के भी बहुत शौकीन थे। बेहद कम समय में उन्होंने जो ख्याति हासिल की वह सराहनीय है। वह मानते थे कि अगर संवेदना है तो अनुभूतियां होती थीं। दलित उनका विरोध करते थे कि यह रहते सवर्णों के साथ हैं और लेखक दलितों का बनते हैं। वह कहते थे दलित लेखन केवल गाली देना ही नहीं है, दलित खुद को परिमार्जित करें।
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सामाजिक व आर्थिक कठिनाईयों में बीता था बचपन
डॉ. तुलसीराम का ताल्लुक आजमगढ़ से था। उनका जन्म एक जुलाई, 1949 को हुआ था। दलित समुदाय में पैदा होने के चलते उनका बचपन कथित मान्यताओं और बंधनों से जूझने के साथ ही सामाजिक एवं आर्थिक कठिनाइयों में बीता। जीवन में उन्हें जो आर्थिक, सामाजिक और मानसिक पीड़ा झेलनी पड़ी, उसने उन्हें लेखक बना दिया। बचपन से किताबों के शौकीन डॉ. तुलसीराम को मार्क्सवाद से बहुत संबल और साहस मिला। बनारस आने के बाद वह कुछ लेखकों से जुड़ गए और डॉ. भीमराव अंबेडकर की रचनाओं का गहन अध्ययन किया।

जैदी चाचा चर्चिल को कहते थे चर्चिलवा
तुलसीराम ने अपनी आत्मकथा मुर्दहिया में लिखा है कि वर्षों बाद जब मैं बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में उच्च शिक्षा ग्रस्त था, तब समझ सका कि जैदी चाचा चर्चिल को चर्चिलवा, सब मैरिन को सबमरी, फाइटर प्लेन को फैटर पलेन, डमडम बुलेट को डम डम, टैंक को टंक, बैनेट को बनेठी, मेसोपोटामिया को मसपोटम, शत् अल् अरब को सटल, रास अल खैमा को खम्मा आदि-आदि कहते थे।
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