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Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Varanasi News ›   Ancestors of Kashi Grandfather himself used to make doniya for both sisters read about Bhaiya Ji Banarasi

काशी के पूर्वज: दोनों बहनों के लिए स्वयं दोनिया काढ़ते थे दादाजी, पढ़ें भइया जी बनारसी के बारे में

Thu, 11 Sep 2025 04:48 PM IST
अमन विश्वकर्मा अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी।
अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी। Published by: अमन विश्वकर्मा Updated Thu, 11 Sep 2025 04:48 PM IST
सार

मोहनलाल गुप्त भइया जी बनारसी की वर्षगांठ आज भी कई आयोजन होते हैं। उनकी जीवनी के कुछ किस्सों को लेकर उनके पाैत्र राजेश गुप्ता ने अमर उजाला से खास बातचीत की।

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Ancestors of Kashi Grandfather himself used to make doniya for both sisters read about Bhaiya Ji Banarasi
भइयाजी बनारस की फाइल फोटो और उनके पाैत्र राजेश गुप्ता। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

जब पहली बार उत्तर प्रदेश में भाजपा की सरकार बनी तो मुख्यमंत्री कल्याण सिंह ने लखनऊ के रवींद्रालय में मोहनलाल गुप्त भइया जी बनारसी की वर्षगांठ पर एक बड़ा कार्यक्रम किया। बनारस के कलेक्टर को जिम्मेदारी दी गई कि आप भइया जी को बनारस से लखनऊ लाएं। मैंने अपने दादा से कहा कि मुझे भी साथ ले चलिए। 

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एक लाइन में उन्होंने उत्तर दिया कि लखनऊ में तुम्हारा क्या काम? यानी परिवारवाद से कोसों दूर लेकिन पुरखों से काफी नजदीक भइया जी हर वर्ष पितृपक्ष में अपने दिवंगत पिता, पितामह और असमय दिवंगत हुईं अपनी दोनों बहनों के लिए स्वयं दोनिया काढ़ते थे। गायों को ढूंढकर अपने हाथों से खिलाते थे। रस्मों को आत्मसात करना उन्हीं (भइया जी) से सीखा। आज भी हम चबूतरे पर ग्रास रखने की रस्म न करके गाय, स्वान को जबतक वो खा न लें, अपने कर्तव्य की इतिश्री नहीं मानते हैं।
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हिंदी हास्य व्यंग्य में अपने चुटीले अंदाज के लिए उनकी गिनती काशी के पंच महाभूतों में हमेशा अजर-अमर है। अपनी लेखनी और पैनेपन से उन्होंने ब्रिटिश साम्राज्य की चूलें हिला दी थीं। जवाहरलाल नेहरू से लगायत इंदिरा गांधी तक उनके व्यंग्य बाण से बच नहीं सके थे। 

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कांग्रेस के कहर को उजागर करने के लिए उनका एक कॉलम नेहरू के नाम पाती, इंदिरा के नाम पाती ने तानाशाही के खिलाफ जनता को उद्वेलित कर दिया था, इसलिए आपातकाल के दौरान उनको जेल भी जाना पड़ा। पूरे देश की हिंदी पत्रकारिता को नवांकुर देने में भइया जी का बहुत बड़ा हाथ था। 

‘अरबी न फारसी भइया जी बनारसी’ नाम के काॅलम ने पूरे शहर में कवित्व की समझ पैदा कर दी। एक बार क्वीन एलिजाबेथ के बुलावे पर जब भइया जी लंदन पहुंचे, तो वहां महारानी ने उनसे पूछा कि आपके अखबार में कितने लोग काम करते हैं। उनका यह प्रश्न अंग्रेजी में था, लेकिन भइया जी ने जानबूझकर हिंदी में उत्तर में दिया कि हम छह लोग छठी का दूध याद दिलाते हैं, तानाशाही को। 

क्वीन को ये बात समझ नहीं आई और उन्होंने भइया जी से निवेदन किया। कृपया इसे अंग्रेजी में बोलिए लेकिन अक्खड़ी भइया जी ने उनको जवाब दिया कि आपको यदि हिंदी में बोलने को कहा जाए तो आप बोलेंगी? इसलिए मैं अंग्रेजी में नहीं बोलूंगा। ये था उनका हिंदी, हिंदू, हिंदुस्तान के प्रति प्रेम।

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