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ऐसी एंबुलेंस किस काम की
ब्यूरो/अमर उजाला, वाराणसी
Updated Sun, 07 Aug 2016 02:29 AM IST
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वीवीआईपी की फ्लीट में एंबुलेंस की सेकेंड लास्ट पोजीशन पर तैनाती जानलेवा साबित हो सकती है। सोनिया गांधी की हालत ज्यादा गंभीर होने की सबसे बड़ी वजह रोड शो के दौरान तबीयत खराब होने पर उनको त्वरित उपचार न मिल पाना है। कहा जा रहा है कि कांग्रेस अध्यक्ष को त्वरित इलाज मिल जाता तो उनकी हालत को गंभीर होने से रोका जा सकता था लेकिन डॉक्टर इसलिए तत्काल नहीं पहुंच सके क्योंकि फ्लीट में लगी एंबुलेंस उनके काफिले की गाड़ियों में 25वें नंबर पर थी। ऐसे में चिकित्सकों तक सूचना पहुंचने में तो देरी हुई ही, भीड़ व अन्य कारणों से उनको उस होटल तक पहुंचने में भी विलंब लगा, जहां सोनिया को आराम के लिए ले जाया गया था।
‘अमर उजाला’ ने इस मुद्दे पर छानबीन की तो उसके मुताबिक लहुराबीर में सोनिया गांधी की तबीयत बिगड़ने और उनको कार से उतार कर होटल में ले जाए जाने के बाद उन तक पहुंचने में डॉक्टरों को 20 मिनट से अधिक का वक्त लगा। इसका कारण वीवीआईपी गाड़ी से एंबुलेंस का काफी दूर होना था। वीवीआईपी की फ्लीट में कौन सी गाड़ी कहां रहेगी, इसका निर्धारण सुरक्षा एजेंसियां और जिला प्रशासन के अधिकारी मिलकर तय करते हैं। एसपी ट्रैफिक कमल किशोर का कहना है कि आमतौर पर इस तरह की फ्लीट में एंबुलेंस की पोजीशन सेकेंड लास्ट की यानी सबसे पीछे टेल कार के पहले होती है। शुक्र है कि सोनिया गांधी के काफिले में 25 गाड़ियां ही थीं। अगर वीवीआईपी गाड़ियों का इससे भी बड़ा काफिला होता तो क्या हालत होती।
सवाल उठता है कि क्या इसमें बदलाव की जरूरत नहीं है? सामाजिक कार्यकर्ता आनंद प्रकाश तिवारी कहते हैं कि वीवीआईपी के काफिले में एसपीजी तो सुरक्षा के लिहाज से तैनात होती है। उनका ध्यान असामाजिक तत्वों पर नजर रखना और वीआईपी को सुरक्षा प्रदान करना है। ऐसे में वीवीआईपी फ्लीट में एंबुलेंस की पोजीशन ऐसी होनी चाहिए जो नजरों के सामने दिखाई देती रहे और जब जरूरत महसूस हो उसे इशारे से भी बुलाया जा सके। बताया जा रहा है कि सोनिया गांधी दो अगस्त को बाबतपुर एयरपोर्ट से जब करीब 16 किमी लंबे रूट को तय कर सर्किट हाउस पहुंचीं, तभी उनकी तबीयत खराब हो गई थी। जिलाध्यक्ष प्रजानाथ शर्मा का कहना है कि सर्किट हाउस में उन्हें डिहाईड्रेशन की वजह से उल्टी हुई थी। इसी वजह से उन्होंने वहां मौजूद किसी नेता से न तो बात की न रुकीं। उन्हें मोमेंटो दिया गया, फिर वह गवर्नर सुइट में चली गईं। सोनिया की तबीयत जब सर्किट हाउस में ही खराब हो गई थी, तब एंबुलेंस के डॉक्टरांे को साथ क्यों नहीं रखा गया या फिर एंबुलेंस फ्लीट में वीवीआईपी के आसपास क्यों नहीं लगाई गई?
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‘अमर उजाला’ ने इस मुद्दे पर छानबीन की तो उसके मुताबिक लहुराबीर में सोनिया गांधी की तबीयत बिगड़ने और उनको कार से उतार कर होटल में ले जाए जाने के बाद उन तक पहुंचने में डॉक्टरों को 20 मिनट से अधिक का वक्त लगा। इसका कारण वीवीआईपी गाड़ी से एंबुलेंस का काफी दूर होना था। वीवीआईपी की फ्लीट में कौन सी गाड़ी कहां रहेगी, इसका निर्धारण सुरक्षा एजेंसियां और जिला प्रशासन के अधिकारी मिलकर तय करते हैं। एसपी ट्रैफिक कमल किशोर का कहना है कि आमतौर पर इस तरह की फ्लीट में एंबुलेंस की पोजीशन सेकेंड लास्ट की यानी सबसे पीछे टेल कार के पहले होती है। शुक्र है कि सोनिया गांधी के काफिले में 25 गाड़ियां ही थीं। अगर वीवीआईपी गाड़ियों का इससे भी बड़ा काफिला होता तो क्या हालत होती।
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सवाल उठता है कि क्या इसमें बदलाव की जरूरत नहीं है? सामाजिक कार्यकर्ता आनंद प्रकाश तिवारी कहते हैं कि वीवीआईपी के काफिले में एसपीजी तो सुरक्षा के लिहाज से तैनात होती है। उनका ध्यान असामाजिक तत्वों पर नजर रखना और वीआईपी को सुरक्षा प्रदान करना है। ऐसे में वीवीआईपी फ्लीट में एंबुलेंस की पोजीशन ऐसी होनी चाहिए जो नजरों के सामने दिखाई देती रहे और जब जरूरत महसूस हो उसे इशारे से भी बुलाया जा सके। बताया जा रहा है कि सोनिया गांधी दो अगस्त को बाबतपुर एयरपोर्ट से जब करीब 16 किमी लंबे रूट को तय कर सर्किट हाउस पहुंचीं, तभी उनकी तबीयत खराब हो गई थी। जिलाध्यक्ष प्रजानाथ शर्मा का कहना है कि सर्किट हाउस में उन्हें डिहाईड्रेशन की वजह से उल्टी हुई थी। इसी वजह से उन्होंने वहां मौजूद किसी नेता से न तो बात की न रुकीं। उन्हें मोमेंटो दिया गया, फिर वह गवर्नर सुइट में चली गईं। सोनिया की तबीयत जब सर्किट हाउस में ही खराब हो गई थी, तब एंबुलेंस के डॉक्टरांे को साथ क्यों नहीं रखा गया या फिर एंबुलेंस फ्लीट में वीवीआईपी के आसपास क्यों नहीं लगाई गई?
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