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Varanasi News: कश्यप बंधुओं के मियां मल्हार की सुरलहरियों से सराबोर हुई संगीत संध्या

Sun, 19 Jul 2026 01:48 AM IST
Varanasi Bureau वाराणसी ब्यूरो
Updated Sun, 19 Jul 2026 01:48 AM IST
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A musical evening steeped in the melodious strains of 'Miyan Malhar' by the Kashyap Brothers.
नागरी प्रचारिणी सभा के स्थापना दिवस समारोह में शामिल हुए आचार्य विवेक दास। अमर उजाला
वाराणसी। नागरी प्रचारिणी सभा के स्थापना दिवस समारोह के अंतिम दिन शनिवार को पद्मभूषण पंडित राजन-साजन मिश्र के शिष्य कश्यप बंधु प्रभाकर और दिवाकर ने अपनी सुरमयी प्रस्तुति से श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया। प्रस्तुति से पहले दोनों कलाकारों ने काशी को अपना ''गुरु घराना'' बताते हुए कहा कि इस नगरी में गायन का अवसर मिलना उनके लिए सौभाग्य की बात है। इसके बाद उन्होंने राग मियां मल्हार की मनोहारी प्रस्तुति देकर संगीत संध्या को यादगार बना दिया। दोनों कलाकारों ने अपनी सधी हुई शास्त्रीय गायकी से श्रोताओं का दिल जीत लिया। मंच पर आने के बाद उन्होंने सबसे पहले अपने गुरुजनों और काशी को नमन किया। उन्होंने कहा, काशी हमारा गुरु घराना है। इस पावन नगरी में प्रस्तुति देने का अवसर मिलना हमारे लिए सौभाग्य और आशीर्वाद के समान है।
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विलंबित और द्रुत लय में प्रस्तुत विभिन्न बंदिशों के माध्यम से उन्होंने राग की गहराई, भाव और स्वर-सौंदर्य का प्रभावशाली प्रदर्शन किया। उनकी सुर साधना, तानों की स्पष्टता और लय पर पकड़ ने पूरी प्रस्तुति के दौरान श्रोताओं को बांधे रखा। बरसात के मौसम के अनुरूप राग मियां मल्हार की प्रस्तुति ने सभागार में अद्भुत संगीतात्मक वातावरण का सृजन किया। प्रस्तुति को और गरिमामय बनाने में हारमोनियम पर वरिष्ठ कलाकार धर्मनाथ मिश्र और तबले पर सिद्धार्थ चक्रवर्ती की संगत का महत्वपूर्ण योगदान रहा। दोनों कलाकारों ने गायन के अनुरूप सधी और संवेदनशील संगत कर प्रस्तुति को प्रभावशाली बनाया। करीब एक घंटे तक चली प्रस्तुति के दौरान श्रोताओं ने कई बार तालियों की गड़गड़ाहट से कलाकारों का उत्साहवर्धन किया।
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प्रह्लाद सिंह टिपानिया ने कबीर के पदों से बांधा समा, निर्गुण भजनों से जीवन-मूल्यों का दिया संदेश
वाराणसी। कबीरवाणी के प्रख्यात गायक प्रह्लाद सिंह टिपानिया ने अपने दल के साथ निर्गुण भजनों की ऐसी रसधारा प्रवाहित की कि पूरा सभागार आध्यात्मिक भाव से सराबोर हो गया। कबीर के पदों को स्वरबद्ध कर उन्होंने जीवन-मूल्यों, आत्मबोध और मानवीय संवेदनाओं का सशक्त संदेश दिया। अपनी सहज और लोकधर्मी गायन शैली में उन्होंने संत कबीर के पदों को स्वर देकर उनके विचारों की प्रासंगिकता और जीवन-दर्शन को प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया। प्रस्तुति के दौरान कबीर के पदों के माध्यम से उन्होंने प्रेम, सत्य, वैराग्य, मानवता और आत्मबोध जैसे जीवन-मूल्यों को रेखांकित किया।उनके गायन में मालवा की लोकधुनों की मिठास और कबीर की वाणी की गहराई का सुंदर संगम दिखाई दिया। श्रोता पूरे समय मंत्रमुग्ध होकर प्रस्तुति का आनंद लेते रहे और कई पदों पर तालियों की गूंज से कलाकारों का उत्साहवर्धन किया। प्रस्तुति को प्रभावी बनाने में उनके साथी कलाकारों की भी महत्वपूर्ण भूमिका रही। अजय टिपानिया ने ढोल पर सधी हुई संगत दी, जबकि देव नारायण सरोलिया ने वायलिन पर मधुर स्वरों से वातावरण को और भावपूर्ण बनाया। धर्मेंद्र टिपानिया ने हारमोनियम तथा मयंक टिपानिया ने मंजीरे की संगत से कबीरवाणी की प्रस्तुति को सशक्त विस्तार दिया। गायन और वाद्ययंत्रों का संतुलित समन्वय कार्यक्रम का विशेष आकर्षण रहा। निर्गुण संगीत की इस प्रस्तुति के साथ समारोह का समापन आध्यात्मिक ऊंचाई और गहरी सांस्कृतिक अनुभूति के साथ हुआ।
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