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‘बादल आयो बसंत बादशाह..’
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वाराणसी। गंगा का सुरम्य तट, वासंती फू लों से उल्लासित ज्ञान प्रवाह परिसर भोपाल से आए पं. उमाकांत गुंदेचा और पं. रमाकांत गुंदेचा के सुरों के प्रवाह से गूंजएमान रहा। मौका था रविवार को सामनेघाट स्थित ज्ञान प्रवाह में आयोजित संगीत कार्यक्रम ‘वासंतिक’ का। जहां देश-दुनिया से जुटे संगीत प्रेमी सुरों के प्रवाह में गोता लगाते रहे। देर शाम तक चले कार्यक्रम मेंगुंदेचा बंधुओं के गायन ने संगीत रसिकों को बांधे रखा।
कार्यक्रम का शुभांरभ गंगा कलश-पूजन और ठाकुर जी को पुष्पाजंलि से किया गया। जिसके बाद शास्त्रीय संगीत साधक ने राग गांगेय भूषण में पारंपरिक आलाप और चौताल में निबद्ध जयशंकर प्रसाद की रचना ‘सब जीवन बीता जाता है...’ की प्रस्तुति की। राग हिंडोल बसंत में निबद्ध एक बंदिश ‘बादल आयो बसंत बादशाह...’ की प्रस्तुति कर श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया। अंत में राग अड़ाना में शिव स्तुति से अपने सुरों को विराम दिया। इनके साथ पखावज पर श्री आदित्यदीप, तानपुरा पर अनुराधा रतूड़ी और पीयूष मद्धेशिया रहे। धन्यवाद संगीत परिषद के अध्यक्ष डॉ. रवींद्र कुमार शाह ने दिया। संचालन ज्ञान प्रवाह की निदेशिका प्रो. कोमल गिरी ने किया।
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कार्यक्रम का शुभांरभ गंगा कलश-पूजन और ठाकुर जी को पुष्पाजंलि से किया गया। जिसके बाद शास्त्रीय संगीत साधक ने राग गांगेय भूषण में पारंपरिक आलाप और चौताल में निबद्ध जयशंकर प्रसाद की रचना ‘सब जीवन बीता जाता है...’ की प्रस्तुति की। राग हिंडोल बसंत में निबद्ध एक बंदिश ‘बादल आयो बसंत बादशाह...’ की प्रस्तुति कर श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया। अंत में राग अड़ाना में शिव स्तुति से अपने सुरों को विराम दिया। इनके साथ पखावज पर श्री आदित्यदीप, तानपुरा पर अनुराधा रतूड़ी और पीयूष मद्धेशिया रहे। धन्यवाद संगीत परिषद के अध्यक्ष डॉ. रवींद्र कुमार शाह ने दिया। संचालन ज्ञान प्रवाह की निदेशिका प्रो. कोमल गिरी ने किया।
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