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लोहे का स्वाद लोहार से मत पूछो...
Updated Fri, 10 Nov 2017 01:46 AM IST
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सेवापुरी/वाराणसी। ‘लोहे का स्वाद लोहार से मत पूछो, उस घोड़े से पूछो जिसके मुंह में लगाम है’। समकालीन युग के जनकवि सुदामा पांडेय धूमिल गांव की माटी से कविता और भाषा सीखी इसीलिए तो उन्होंने सत्ता के हुक्मरानों द्वारा गरीबों को दी जा रही यातनाओं को करीब से देखा। यह बातें आराजीलाइन विकास क्षेत्र के खेवली में आयोजित धूमिल के जयंती समारोह में बतौर मुख्य अतिथि प्रो. श्रद्धानंद सिंह ने कहीं।
उन्होंने कहा कि हमारे देश के तमाम कवियों एवं रचनाकारों ने अपनी कविता और रचना कठोर शब्दों में लिखकर सिर्फ उनको समझाने की कोशिश की जो गरीबों पर जुल्म ढाते थे। लेकिन धूमिल ने अपनी गंवई माटी से सीखी आम शब्दावली से कविताओं को लिखकर उन गरीबों के दर्द को सबको समझाने की कोशिश की। धूमिल 1962 की लड़ाई में चीन से हुई पराजय को लेकर काफी व्यथित थे। उस समय भी उन्होंने सत्ता भोगियों के खिलाफ तीखी चुटीली कविताओं के माध्यम से करारा प्रहार किया था। धूमिल ने कहा था कि ‘अपने यहां लोकतंत्र एक ऐसा तमाशा है जिसकी जान मदारी की भाषा है’।
प्रो. अवधेश सिंह प्रधान ने कहा कि धूमिल ने एक सपना सजोया था कि भारत आजाद होने के बाद सबको छत व बराबरी का हक मिलेगा लेकिन सत्ता में बैठे लोगों ने ठीक उलट कार्य किया। तमाम सरकारें आईं लेकिन गरीबों के दर्द ज्यो की त्यों बना है। धूमिल कभी जाति और धर्म की लड़ाई नहीं लड़ी बल्कि बल्कि गरीबों की लड़ाई लड़ी।
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जयंती में जुटे कवियों ने एक स्वर से खेवली में धूमिल की प्रतिमा लगाने की मांग की। दो वर्ष पूर्व भी क्षेत्रीय विधायक ने प्रतिमा लगाने की घोषणा की थी लेकिन लग नहीं सकी। कवियों ने इस पर अफसोस जताया। जयंती समारोह में धूमिल के चित्र पर उनकी धर्म पत्नी मूरत देवी पुष्प अर्पित करते समय फफक पड़ीं। समारोह को डॉ. रत्नेश पांडेय, डॉ. वाचस्पति सिंह, डॉ. रामेश्वर सिंह, आचार्य पंकज, डॉ. महेंद्र सिंह पटेल, आनंद शंकर पांडेय ने संबोधित किया। कार्यक्रम का संचालन नंदलाल पटेल ने किया।
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उन्होंने कहा कि हमारे देश के तमाम कवियों एवं रचनाकारों ने अपनी कविता और रचना कठोर शब्दों में लिखकर सिर्फ उनको समझाने की कोशिश की जो गरीबों पर जुल्म ढाते थे। लेकिन धूमिल ने अपनी गंवई माटी से सीखी आम शब्दावली से कविताओं को लिखकर उन गरीबों के दर्द को सबको समझाने की कोशिश की। धूमिल 1962 की लड़ाई में चीन से हुई पराजय को लेकर काफी व्यथित थे। उस समय भी उन्होंने सत्ता भोगियों के खिलाफ तीखी चुटीली कविताओं के माध्यम से करारा प्रहार किया था। धूमिल ने कहा था कि ‘अपने यहां लोकतंत्र एक ऐसा तमाशा है जिसकी जान मदारी की भाषा है’।
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प्रो. अवधेश सिंह प्रधान ने कहा कि धूमिल ने एक सपना सजोया था कि भारत आजाद होने के बाद सबको छत व बराबरी का हक मिलेगा लेकिन सत्ता में बैठे लोगों ने ठीक उलट कार्य किया। तमाम सरकारें आईं लेकिन गरीबों के दर्द ज्यो की त्यों बना है। धूमिल कभी जाति और धर्म की लड़ाई नहीं लड़ी बल्कि बल्कि गरीबों की लड़ाई लड़ी।
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जयंती में जुटे कवियों ने एक स्वर से खेवली में धूमिल की प्रतिमा लगाने की मांग की। दो वर्ष पूर्व भी क्षेत्रीय विधायक ने प्रतिमा लगाने की घोषणा की थी लेकिन लग नहीं सकी। कवियों ने इस पर अफसोस जताया। जयंती समारोह में धूमिल के चित्र पर उनकी धर्म पत्नी मूरत देवी पुष्प अर्पित करते समय फफक पड़ीं। समारोह को डॉ. रत्नेश पांडेय, डॉ. वाचस्पति सिंह, डॉ. रामेश्वर सिंह, आचार्य पंकज, डॉ. महेंद्र सिंह पटेल, आनंद शंकर पांडेय ने संबोधित किया। कार्यक्रम का संचालन नंदलाल पटेल ने किया।