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प्राचीन ज्ञान और परंपराओं में विश्व शांति की सामर्थ्य
Updated Mon, 01 Jan 2018 02:33 AM IST
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वाराणसी। धर्मगुरु दलाई लामा ने कहा कि अपने प्राचीन और विशिष्ट ज्ञान की बदौलत ही भारत कभी ‘गुरु’ था। आज यही भारत अपनी इसी विशिष्टता को भूलकर आधुनिक दुनिया के पथ पर चलने लगा है। भारतीय ज्ञान, संस्कृति और परंपराओं में ही वह सामर्थ्य है, जिससे भारत अकले नहीं बल्कि पूरे विश्व को शांति पथ पर ला सकता है। भारत को अपने मूल से जुड़े रहने की जरूरत है। भारत अपने ज्ञान को पुनर्जीवित कर दुनिया के बेहतर दिशा की ओर ले जाने में अपना योगदान दे सकता है।
दलाई लामा ने रविवार को सारनाथ स्थित केंद्रीय उच्च तिब्बती शिक्षा संस्थान की स्वर्ण जयंती पर आयोजित अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी ‘भारतीय दार्शनिक प्रस्थानों एवं आधुनिक विज्ञान में मन की अवधारणा’ के समापन सत्र में ये बातें कहीं। उन्होंने कहा कि लोग कबूतर उड़ाकर शांति का संदेश देते हैं लेकिन मैं नहीं मानता कि कबूतर उड़ाने से शांति की स्थापना की जा सकती है। हम शांति स्थापित करना चाहते हैं तो पहले आंतरिक शांति स्थापित करनी होगी। कहा कि पहले जानवर इंसान को मारता था तो वो खबर बनती थी, लेकिन दुखद है कि आज इंसान इंसान को मार रहा है और हम इसे गंभीरता से नहीं ले रहे। ये भयावह है। ऐसे विध्वंसकारी भावनाओं पर काबू पाने की जरूरत है। हमें इस मानसिकता को बदलना होगा। ये सिर्फ भारतीय ज्ञान परंपरा से ही संभव है। उन्होंने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपराएं मनुष्य की आंतरिक शांति और मन की भावनाओं के नियंत्रण में रख सकती हैं। आज हमारे सामने कई समस्याएं हैं जिनका समाधान भारत के प्राचीन ज्ञान और विज्ञान में हैं। देश की सरहद से ऊपर उठकर हमें मानवता के हित में कार्य करना होगा।
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दलाई लामा ने रविवार को सारनाथ स्थित केंद्रीय उच्च तिब्बती शिक्षा संस्थान की स्वर्ण जयंती पर आयोजित अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी ‘भारतीय दार्शनिक प्रस्थानों एवं आधुनिक विज्ञान में मन की अवधारणा’ के समापन सत्र में ये बातें कहीं। उन्होंने कहा कि लोग कबूतर उड़ाकर शांति का संदेश देते हैं लेकिन मैं नहीं मानता कि कबूतर उड़ाने से शांति की स्थापना की जा सकती है। हम शांति स्थापित करना चाहते हैं तो पहले आंतरिक शांति स्थापित करनी होगी। कहा कि पहले जानवर इंसान को मारता था तो वो खबर बनती थी, लेकिन दुखद है कि आज इंसान इंसान को मार रहा है और हम इसे गंभीरता से नहीं ले रहे। ये भयावह है। ऐसे विध्वंसकारी भावनाओं पर काबू पाने की जरूरत है। हमें इस मानसिकता को बदलना होगा। ये सिर्फ भारतीय ज्ञान परंपरा से ही संभव है। उन्होंने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपराएं मनुष्य की आंतरिक शांति और मन की भावनाओं के नियंत्रण में रख सकती हैं। आज हमारे सामने कई समस्याएं हैं जिनका समाधान भारत के प्राचीन ज्ञान और विज्ञान में हैं। देश की सरहद से ऊपर उठकर हमें मानवता के हित में कार्य करना होगा।
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