फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Varanasi News ›   मनमुताबिक कर दिया मंदिरों का नामकरण

मनमुताबिक कर दिया मंदिरों का नामकरण

Sun, 03 Feb 2019 01:54 AM IST
Varanasi Bureau वाराणसी ब्यूरो
Updated Sun, 03 Feb 2019 01:54 AM IST
विज्ञापन
मनमुताबिक कर दिया मंदिरों का नामकरण
वाराणसी। मकानों की ओट में छिपे मंदिर सामने आने के बाद विश्वनाथ कॉरिडोर क्षेत्र के लोगों के लिए जिज्ञासा का विषय बन गए। बाहर से आने वाले श्रद्धालु ही नहीं, काशी के लोग भी इन मंदिरों को देखने के लिए गलियों में धूल फांक रहे हैं। बरसों से दबे-ढके इन मंदिरों का इतिहास भी कहीं दबा हुआ है, जिसे खोजने की कोई पहल नजर नहीं आती। कुछ मंदिरों का तो इतिहास ही बदल दिया गया है। या यूं कहें कि मनमुताबिक उनका नामकरण और कालखंड निर्धारित कर दिया। प्रवासी भारतीय सम्मेलन के दौरान आननफानन इन मंदिरों की बुकलेट बनाकर बांट दी गई। यही नहीं, सभी मंदिरों के बाहर मंदिर न्यास की ओर से बोर्ड लगाकर उन्हें नई पहचान दे दी गई, जो है ही नहीं। लाहौरी टोला के एक शिवालय को गुप्त काल का लिखकर प्रचारित कर दिया गया। प्रवासी तो गलत जानकारी लेकर चले गए, वहीं कॉरिडोर से रोज गुजरने वाले श्रद्धालु भी इसी इतिहास को पढ़कर आगे बढ़ जाते हैं। क्या करें, मंदिर बोल जो नहीं सकते।
विज्ञापन

कॉरिडोर क्षेत्र में अब तक करीब 30 मंदिर अधिगृहीत किए जा चुके हैं। इनमें से कई का नाम सर्वविदित हैं, जबकि कुछ अज्ञात हैं। इनके अनुसंधान की आवश्यकता है, लेकिन इस दिशा में कोई कार्य नहीं हुआ। सम्मेलन के दौरान जल्दबाजी में मंदिरों की बुकलेट निकाल कर प्रवासियों को बांट दी गई। साथ ही सभी मंदिरों के सामने बोर्ड लगा दिए गए। जो अज्ञात थे, उनमें से कुछ का इतिहास अपने हिसाब से बना लिया गया और उनके नाम भी रख दिए।
विज्ञापन

इसमें लाहौरी टोला के मकान नंबर सीके 34/37 में मिला वह मंदिर भी है, जिसे लेकर कई तरह की चर्चाएं हैं। इसकी बनावट काशी विश्वनाथ मंदिर जैसी है। आमजन इसे बड़ा भाई-छोटा भाई मंदिर के नाम से जानते हैं। बुकलेट और मंदिर न्यास की ओर से बोर्ड में इस मंदिर को सम्राट चंद्रगुप्त द्वारा स्थापित लिखा गया है। लिखे गए विवरण के अनुसार ‘यह मंदिर गुप्तकालीन है। इसका नाम चंद्रगुप्त महादेव है।’ यह जानकारी सबसे ज्यादा भ्रामक है।
विज्ञापन
विज्ञापन

इसी मंदिर से पहले एक और मंदिर है। इसे शिव मुकानेश्वर नाम दिया है। यहां भी घोर लापरवाही की गई। मंदिर के शिलालेख में इसे एकादश ज्योर्तिलिंग लिखा गया है। इसका निर्माण संवत 1877 में हुआ। अधिगृहण के बाद भी सेवा पूजा करने आ रहे गुलशन गोस्वामी ने बताया कि हमने शिव मुकानेश्वर नाम कभी नहीं सुना। न ही किसी ने हमसे मंदिर के नाम के बारे में पूछा। इसका नाम एकादश-द्वादश ज्योर्तिलिंग है।

कॉरिडोर में अधिगृहीत मकानों में मिले मंदिरों में शिल्प का उत्कृष्ट उदाहरण मणिकर्णिका गली स्थित शिवालय भी है। इसे कुंभा महादेव लिखा गया है और 500 साल पुराना बताया गया है। मकान नंबर सीके 10/27 में मिले इस मंदिर को शुरुआत में समुद्र मंथन कहा गया। मंदिरों की खोजबीन करते हुए लोग इसके पुजारी अनूप शर्मा आचार्य से मिले। उन्होंने बताया कि इस मंदिर का नाम इंद्र समुद्रेश्वर है। रामपुर, अलवर स्टेट के राजा नीमचंद्र ने इसका निर्माण कराया था। हमारे पास 1857 तक के कागज उपलब्ध हैं। पूर्वजों के अनुसार यह मंदिर करीब 350 साल प्राचीन है। न्यास द्वारा गलत बोर्ड लगाया गया है। हमसे कुछ पूछा नहीं गया। काशी करवत के पास एक शिव मंदिर भी है, जिसे कोनेश्वर महादेव मंदिर का नाम दे दिया गया है। इसका इतिहास भी गुमनाम है।
विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed