Volleyball: 80 के दशक में काशी की गलियों में भी लगती थी वॉली, बदलते दौर में सिमटता एक गौरवशाली खेल
वॉलीबॉल को लेकर काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के पूर्व कोच विद्यासागर ने अमर उजाला से खास बातचीत की। इसमें उन्होंने इस खेल का काफी रोचक इतिहास बताया। कहा कि समय के साथ इसके नियम भी बदलते गए।
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वॉलीबॉल से बनारस का रिश्ता नया नहीं बल्कि दशकों पुराना है। यह वह दौर था जब खेल मैदान केवल मैदान नहीं बल्कि मोहल्लों की पहचान हुआ करते थे। चेतगंज में कभी कैंब्रिज क्लब वॉलीबॉल का बड़ा केंद्र हुआ करता था जहां शाम ढलते ही दर्शकों की भीड़ जुट जाती थी । अब वहां पर सेल्स टैक्स ऑफिस है।
80 के दशक में बनारस में वॉलीबॉल का क्रेज अपने चरम पर था। उस समय बीएलडब्ल्यू और एनईआर की टीमों के बीच होने वाले मुकाबले कांटे की माने जाते थे। रेलवे की इन टीमों में खेलना गौरव की बात समझी जाती थी। चयन के लिए खिलाड़ी मेहनत करते थे। शहर के अलईपुरा, बीएचयू, लाहतारा, चेतगंज और रेनी आर्ट जैसे इलाकों के खेल मैदान भी वॉलीबॉल मैच के गवाह रहे हैं।
बीएचयू के पूर्व वॉलीबॉल कोच विद्यासागर सिंह ने बताया कि एक समय बनारस में करीब 21 स्थानों पर वॉलीबॉल प्रतियोगिताएं होती थीं। ग्रामीण इलाकों में सेवापुरी, पिंडरा, चोलापुर आदि क्षेत्रों में वॉलीबॉल बेहद लोकप्रिय रहा जहां मिट्टी के मैदानों पर रात्रिकालीन प्रतियोगिताएं होती थीं। उस दौर में वॉलीबॉल केवल आउटडोर कोर्ट पर खेला जाता था। संवाद
कड़े थे तब के नियम
पूर्व वॉलीबॉल कोच विद्यासागर ने बताया कि वॉली पर फिंगर टच होते ही रेफरी फॉल की सीटी बजा देता था। खिलाड़ियों की तैयारी भी सादगी भरी लेकिन दमदार होती थी। चना, दूध और मक्का ही उनकी ताकत का स्रोत था। उस दौर में न सप्लीमेंट थे, न आधुनिक डाइट थी फिर भी खिलाड़ियों में जुनून और जज्बा भरपूर नजर आता था।
इनडोर तक सीमित हुआ खेल
उन्होंने बताया कि अब इंडोर स्टेडियम और प्रोफेशनल लीग का दौर है, तब बनारस का यह स्वर्णिम अध्याय कहीं पीछे छूटता दिख रहा है। लेकिन पुराने खिलाड़ी और खेल प्रेमी आज भी कहते हैं कि वॉलीबॉल ने बनारस को सिर्फ खिलाड़ी नहीं, अनुशासन और एकजुटता भी दी है।