{"_id":"5c44de84bdec22130951fc69","slug":"181548017284-varanasi-news","type":"story","status":"publish","title_hn":"सूफी गीतों से सजी काशी गंगा महोत्सव की पहली शाम","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
सूफी गीतों से सजी काशी गंगा महोत्सव की पहली शाम
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
वाराणसी। काशी की विरासत में शुमार गंगा महोत्सव की सुरमई शाम की शुरुआत शनिवार को हो गई और इस साल राजघाट इसका साक्षी बना। सूफी और लोकगीतों के साथ ये सांस्कृतिक संध्या शास्त्रीय और पाश्चात्य नृत्य से सजी। कथक, भरतनाट्यम के साथ स्पेन के लोकनृत्य फ्लैमिंको का फ्यूजन नृत्य ने काशी महोत्सव को यादगार बना दिया। यूट्यूब पर अपने भजन और लोकगीतों से मशहूर बाल कलाकार मैथिली ठाकुर ने अपने सुर और साज से इस महोत्सव की शान बढ़ा दी।
मैथिली ने अपनी प्रस्तुति की शुरुआत प्रवासी भारतीयों के नाम की ‘केसरिया बालम पधारो म्हारे देस...’ से की। इसके बाद सूफी गीत ‘छाप तिलक सब छिनी मोसे नयना मिलाइके...’ प्रस्तुत किया। पहली बार काशी आयीं मैथिली ने भजन ‘जो भजे हरि को सदा...’, सोहर ‘जुग जुग जियसु ललनवा...’ सुनाकर सभी को मुग्ध किया। होरी और ठुमरी ‘खेलें मसाने में होरी...’ और ‘रंगी सारी गुलाबी...’ से भी संगीतप्रेमियों को विभोर किया।
इनसे पहले कथक के तत्कार की थाप, भरतनाट्यम के भाव और फ्लेमेंको की त्रिवेणी का संगम हुआ। वक्त्रस्तुंड महाकाय... के बोल पर मोनालिसा रॉय ने भरतनाट्यम से इस फ्यूजन नृत्य की शुरुआत की। पंडित सुखदेव मिश्र के संयोजन में शास्त्रीय सुरों के साथ वेस्टर्न म्यूज़िक की जुगलबंदी भी इस प्रस्तुति में ख़ास रही। इनके साथ गिटार पर पैबलो, कैथोन पर डा. नवीन चंद्र, तबले पर पंडित ललित कुमार, मृदंगम पर पंडित विश्वनाथ व वोकलिस्ट एलिस ने संगत किया। इस काशी गंगा महोत्सव का शुभारंभ प्रणव कुमार ने अपनी गायकी से किया। शिव स्तुति के बाद उन्होंने प्रवासी भारतीय दिवस का थीम गीत ‘देस पुकारे, चाँद सितारे राह निहारे...’ प्रस्तुत कर काशी गंगा महोत्सव को प्रवासी मेहमानों के नाम किया। इसके बाद सूफ़ी गीत ‘सैयां...’ और ‘मैं तो तेरी चरणों की दासी हूँ हुज़ूर...’ प्रस्तुत किया। ‘अच्छा चलता हूँ, दुआओं में याद रखना...’ से समापन किया। महोत्सव का शुभारंभ डा. नीलकंठ तिवारी और कमिश्नर दीपक अग्रवाल ने दीप प्रज्ज्वलन कर किया।
विज्ञापन
विज्ञापन
मैथिली ने अपनी प्रस्तुति की शुरुआत प्रवासी भारतीयों के नाम की ‘केसरिया बालम पधारो म्हारे देस...’ से की। इसके बाद सूफी गीत ‘छाप तिलक सब छिनी मोसे नयना मिलाइके...’ प्रस्तुत किया। पहली बार काशी आयीं मैथिली ने भजन ‘जो भजे हरि को सदा...’, सोहर ‘जुग जुग जियसु ललनवा...’ सुनाकर सभी को मुग्ध किया। होरी और ठुमरी ‘खेलें मसाने में होरी...’ और ‘रंगी सारी गुलाबी...’ से भी संगीतप्रेमियों को विभोर किया।
विज्ञापन
इनसे पहले कथक के तत्कार की थाप, भरतनाट्यम के भाव और फ्लेमेंको की त्रिवेणी का संगम हुआ। वक्त्रस्तुंड महाकाय... के बोल पर मोनालिसा रॉय ने भरतनाट्यम से इस फ्यूजन नृत्य की शुरुआत की। पंडित सुखदेव मिश्र के संयोजन में शास्त्रीय सुरों के साथ वेस्टर्न म्यूज़िक की जुगलबंदी भी इस प्रस्तुति में ख़ास रही। इनके साथ गिटार पर पैबलो, कैथोन पर डा. नवीन चंद्र, तबले पर पंडित ललित कुमार, मृदंगम पर पंडित विश्वनाथ व वोकलिस्ट एलिस ने संगत किया। इस काशी गंगा महोत्सव का शुभारंभ प्रणव कुमार ने अपनी गायकी से किया। शिव स्तुति के बाद उन्होंने प्रवासी भारतीय दिवस का थीम गीत ‘देस पुकारे, चाँद सितारे राह निहारे...’ प्रस्तुत कर काशी गंगा महोत्सव को प्रवासी मेहमानों के नाम किया। इसके बाद सूफ़ी गीत ‘सैयां...’ और ‘मैं तो तेरी चरणों की दासी हूँ हुज़ूर...’ प्रस्तुत किया। ‘अच्छा चलता हूँ, दुआओं में याद रखना...’ से समापन किया। महोत्सव का शुभारंभ डा. नीलकंठ तिवारी और कमिश्नर दीपक अग्रवाल ने दीप प्रज्ज्वलन कर किया।
विज्ञापन