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गंगा भले मैली हो जाए, कपड़े सफेद रहने चाहिए

Thu, 22 Feb 2018 03:00 AM IST
Updated Thu, 22 Feb 2018 03:00 AM IST
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गंगा भले मैली हो जाए, कपड़े सफेद रहने चाहिए
वाराणसी। काशी के जिन घाटों से विश्व के लोगों की आस्था जुड़ी है, उन घाटों पर जीवनदायी गंगा को मैला करने वाले जरा भी संकोच नहीं कर रहे। वे गंदे कपड़े और जानवरों को गंगा में खुलेआम धो रहे हैं। रानी घाट से लेकर निषाद घाट तक कपड़ा धुलने वालों की भरमार है। घाट पर कपड़ों का अंबार देखकर लगता है कि पूरे शहर के कपड़े यहीं धोए जाते हैं। घरों की गंदगी और कूड़ा भी लोग गंगा में फेंकने से परहेज नहीं करते हैं। शिव की नगरी में मां गंगा के घाट छोड़ने और प्रदूषण के भयावह स्तर पर पहुंचने के बाद भी घाट के किनारे रहने वाले इस ओर ध्यान ही नहीं दे रहे।
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शहर के सीवेज, नालों और गंदगी से गंगा में प्रदूषण का स्तर लगातार बढ़ता ही जा रहा है। गंदगी की बात करें तो खिड़किया घाट के बाद रानी घाट से गायघाट के बीच सफाई की स्थिति भी बेहद खराब है। भैंसासुर घाट के पहले गंगा में पशुपालक अपनी भैंसों को नहाने के लिए छोड़ देते हैं। भैंसें गंगा में ही मलमूत्र त्याग करती हैं।
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जैसे ही रानी घाट से आगे बढ़ते हैं तो काफी संख्या में लोग गंगा के पानी में ही कपड़े धुलते हुए नजर आते हैं। कपड़ों का अंबार यह बताने के लिए काफी है कि पूरे शहर के कपड़े गंगा घाट पर ही धोए जा रहे हैं। जिम्मेदार अधिकारियों की तो इस ओर नजर ही नहीं जा रही। घाट किनारे रहने वाले भी इसे लेकर खास चिंतित नहीं दिख रहे। गंगा के इस हाल के लिए सरकारी उदासीनता के साथ ही उसे गंदा करने वालों और मौन रहकर गंदा होते देखते रहने वालों का रवैया जिम्मेदार है।
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