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न्यास की अनुमति बिना ही कराया कुंभाभिषेक
Updated Sat, 07 Jul 2018 01:56 AM IST
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वाराणसी। श्री काशी विश्वनाथ मंदिर के स्वर्ण शिखर के कुंभाभिषेक पर विवाद शुरू हो गया है। कुंभाभिषेक के लिए विश्वनाथ मंदिर न्यास परिषद की अनुमति ही नहीं ली गई थी। मंदिर न्यास परिषद के अध्यक्ष आचार्य अशोक द्विवेदी ने इसे विश्वनाथ मंदिर अधिनियम, प्रथा और परंपराओं का उल्लंघन बताया है। उन्होंने इसे अशास्त्रीय बताते हुए जांच की मांग की है। दक्षिण भारतीय मंदिरों में होने वाली कुुंभाभिषेक की प्रक्रिया को विश्वनाथ मंदिर के इतिहास में पहली बार किया गया है।
18 मई को काशी विश्वनाथ मंदिर न्यास परिषद की बैठक में इस मुद्दे पर चर्चा हुई थी। इस दौरान न्यास अध्यक्ष ने साफ कहा था कि नर्मदा से सिंधु नदी तक यह प्रथा पूरे उत्तर भारत में लागू नहीं है। खासकर विश्वनाथ मंदिर में कभी भी ऐसा नहीं हुआ है। उन्होंने इसके लिए शृंगेरी मठ के शंकराचार्य से परामर्श लेने का निर्देश दिया था। बावजूद इसके मंदिर परिसर में चार दिवसीय कुंभाभिषेक का आयोजन किया गया।
दक्षिण भारत के मंदिर शिखर पर देवी-देवताओं के अनेक विग्रह स्थापित होते हैं और उन विग्रहों की साफ-सफाई के लिए कुंभाभिषेक का आयोजन होता है। वहीं उत्तर भारत के मंदिरों में शिखर पर विग्रह की स्थापना ही नहीं होती है। महारानी अहिल्याबाई ने जब मंदिर का जीर्णोद्धार कराया था और महाराजा रणजीत सिंह ने स्वर्ण शिखर के लिए 26 मन सोना दान दिया था तो उस दौरान भी कुंभाभिषेक नहीं हुआ था।
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18 मई को काशी विश्वनाथ मंदिर न्यास परिषद की बैठक में इस मुद्दे पर चर्चा हुई थी। इस दौरान न्यास अध्यक्ष ने साफ कहा था कि नर्मदा से सिंधु नदी तक यह प्रथा पूरे उत्तर भारत में लागू नहीं है। खासकर विश्वनाथ मंदिर में कभी भी ऐसा नहीं हुआ है। उन्होंने इसके लिए शृंगेरी मठ के शंकराचार्य से परामर्श लेने का निर्देश दिया था। बावजूद इसके मंदिर परिसर में चार दिवसीय कुंभाभिषेक का आयोजन किया गया।
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दक्षिण भारत के मंदिर शिखर पर देवी-देवताओं के अनेक विग्रह स्थापित होते हैं और उन विग्रहों की साफ-सफाई के लिए कुंभाभिषेक का आयोजन होता है। वहीं उत्तर भारत के मंदिरों में शिखर पर विग्रह की स्थापना ही नहीं होती है। महारानी अहिल्याबाई ने जब मंदिर का जीर्णोद्धार कराया था और महाराजा रणजीत सिंह ने स्वर्ण शिखर के लिए 26 मन सोना दान दिया था तो उस दौरान भी कुंभाभिषेक नहीं हुआ था।
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