फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   uttar pradesh government unrelenting pain of rape

बलात्कार के दर्द पर बेदर्द उत्तर प्रदेश सरकार

Thu, 03 Jan 2013 12:00 AM IST
लखनऊ/अखिलेश वाजपेयी
लखनऊ/अखिलेश वाजपेयी Updated Thu, 03 Jan 2013 12:00 AM IST
विज्ञापन
uttar pradesh government unrelenting pain of rape

उत्तर प्रदेश सरकार दिल्ली में दुष्कर्म की शिकार युवती के परिजनों को 20 लाख रुपये दे रही है और जहां के पुलिस महानिदेशक बलात्कार के दोषियों को मौत की सजा देने की पैरोकारी कर रहे हैं, उस राज्य में बलात्कार की शिकार बच्चियों के इलाज के अभाव में दम तोड़ देने की बात बेहद तकलीफदेह है।

विज्ञापन


कहीं कोई सुनने वाला नहीं है। बलरामपुर जैसे कुछ जिले ऐसे भी हैं जहां जिला महिला अस्पताल में कोई ऐसी महिला चिकित्सक नहीं है जो दुष्कर्म का शिकार पीड़िता की डॉक्टरी जांच कर सके, यानी जिसे सर्जरी का अनुभव हो।
विज्ञापन


पूर्व पुलिस महानिदेशक के.एल. गुप्ता कहते हैं कि कानून तो हैं लेकिन उन पर पूरी तरह अमल नहीं हो पाता। इसी से किसी को खौफ नहीं रह गया है। महिलाओं से होने वाले अन्याय के खिलाफ संघर्ष करने वाली एकेडमिक स्टाफ कॉलेज की पूर्व निदेशक प्रो. निशि पांडेय कहती हैं कि इस तरह की वारदात में ज्यादातर शिकार गरीब परिवारों के लोग होते हैं।
विज्ञापन
विज्ञापन


अक्सर देखा गया है कि आरोपी या उसका कोई संरक्षक अथवा परिवार पैसे में या अन्य किसी वजह से इतना प्रभावशाली होता है कि पुलिस भी कार्रवाई करने के बजाय तरह-तरह के बहाने गढ़ती है।

प्रो. पांडेय व के. एल. गुप्ता दोनों लोगों का मानना है कि केवल कानून बना देने से ये वारदात रुकने वाली नहीं। इसके लिए समाज में जैसी जागरूकता और संवदेनशीलता होनी चाहिए, वह अभी नहीं दिखाई देती। कानून का खौफ भी पैदा करना होगा। तभी स्थितियां सुधरेंगी। अगर उत्तर प्रदेश सरकार के कार्यकाल की ही बात करें तो 16 मार्च से 15 दिसंबर तक पुलिस विभाग के आंकड़े ही इसकी गंभीरता का एहसास करा देते हैं।

ऐसी घटनाओं में तस्वीर का दूसरा पहलू बलरामपुर जैसे जिले हैं। यहां महिला चिकित्सा की कोई व्यवस्था ही नहीं है। जिला महिला चिकित्सालय में सर्जन की कुर्सी पिछले डेढ़ साल से खाली है। वर्ष 2012 में लगभग 14 दुराचार के मामलों में पीड़िताओं को मेडिकल के लिए गोंडा भेजना पड़ा।

जिला महिला चिकित्सालय की अधीक्षक डॉ. नीना वर्मा बाल रोग विशेषज्ञ हैं। महिला चिकित्सालय में पुरुष सर्जन डॉ. आरके सिंह को संबद्ध किया गया है। अधिकतर महिलाएं पुरुष सर्जन से ऑपरेशन कराने के लिए तैयार नहीं होती हैं।

केस-1: मौत के बाद पुलिस ने बंद की फाइल
घटना 9 मार्च 2012। बहराइच-नानपारा मार्ग पर लावारिस युवती (19) मिली थी। शरीर पर खरोचों के निशान भी थे। लोगों ने उसे नानपारा सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में कराया। हालत बिगड़ने लगी तो उसे बहराइच जिला चिकित्सालय भेजा। इलाज में कोताही पर तीन दिन बाद 12 मार्च को युवती की मौत। पोस्टमार्टम में दुराचार की पुष्टि। पुलिस ने युवती के लावारिस होने के चलते फाइल बंद कर दी।

केस-2: बच्ची ने तड़प-तड़प कर तोड़ दिया दम
घटना 05 मई 2012। कानपुर के टाटमिल इलाके में छह साल की एक बच्ची अधेड़ की हवस का शिकार हो गई। पानी बेचकर परिवार का पेट पालने वाले बच्ची के मां व बाप लहूलुहान बच्ची को लेकर हैलट अस्पताल पहुंचे। हैलेट के गंदे से बेड पर पड़ी बच्ची के घावों पर गंदगी लगने से संक्रमण हो गया। महंगी दवाई लाना मां-बाप के बस में नहीं था। दर्द से तड़प रही बच्ची ने 30 जून को दम तोड़ दिया।

केस-3: बेटी के इलाज पर खर्च से परिवार बेदम
घटना कानपुर की। 16 अक्तूबर 2012 को सुजातगंज रेल बाजार में रहने वाली सात साल की बच्ची को किसी ने अगवा कर लिया। हवस का शिकार बनाया और लहूलुहान हालत में रेलवे क्रॉसिंग के पास छोड़ा। डफरिन में भर्ती बच्ची का इलाज चल रहा है। पुलिस दरिंदे की तलाश नहीं कर पाई है। गरीब मां-बाप बच्ची के इलाज 40-45 हजार रुपये खर्च कर बुरी तरह टूट चुके हैं। पिता का कहना है, ‘गरीबों की तो न सरकार सुनती है न ही कोई और’।

सुधारना तो सिस्टम को होगा
उत्तर प्रदेश के पूर्व पुलिस महानिदेशक के.एल. गुप्ता के मुताबिक दंड प्रक्रिया संहिता सीधे कहती हैं कि पुलिस ऐसे मामलों में तीन महीनों में तफ्तीश पूरी करे। फास्ट ट्रैक कोर्ट रोज सुनवाई करे। पर, सरकार ने धन की कमी का तर्क देकर फास्ट ट्रैक कोर्ट ही खत्म कर दी।

जब 10-15 साल किसी मामले की सुनवाई में लगेंगे तो किसे खौफ होगा। पुलिस बल कम है, जो है उसमें भी आधा विशिष्ट लोगों की सुरक्षा में लगा रहता है। ऐसे में तफ्तीश समय पर नहीं होती। दुष्कर्मी पकड़ में नहीं आते। अगर पकड़ में आ जाते हैं तो पीड़ित परिवार लंबी पूछताछ और वकीलों के सवालों से घबराकर अपने दर्द पर कार्रवाई कराने की कोशिश के बजाय घुट-घुटकर बर्दाश्त करने को ही प्राथमिकता देता है।


इसके लिए पूरे सिस्टम में सुधार जरूरी है। शायद ही कोई राजनीतिक दल ऐसा हो जिसमें इस तरह के आरोप वाले लोगों को जगह न मिली हो। अगर ऐसे लोग सरकार में पहुंच जाएंगे तो कहां से आएगी संवेदनशीलता?

सपा सरकार बनने के बाद 15 दिसंबर तक
--1533 प्रदेश में बलात्कार की घटनाएं।
--39 नाबालिग लड़कियां हुईं शिकार।
--2983 शीलभंग के मामले।
--1369 छेड़खानी की घटनाएं।
--13,263 मामले सत्र न्यायालयों में विचाराधीन।

विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed